फिर ग़मे-मोहब्बत की आख़िरी निशानी पर
एक शे'र देखें आँखों से निकले पानी पर
इक सिवा मोहब्बत के कुछ न हो सका मुझसे
मुझको यार लानत है अपनी ही कहानी पर
मेरा प्रेम उड़ता पंछी मगर मैं इक पिंजरा
दिल ने यों भी रक्खा दरबान पासबानी पर
दुःख वो लिखें ही क्यूँँ जिसको जी नहीं सकता
जंग ख़ुदस क्यूँँ लड़ना दिल की ख़ू-फ़िसानी पर
और तुम्हें फ़क़त आँखें चाहती हैं ये दिल नईं
दिल ज़ब्त होगा सीरत की मेज़बानी पर
'नीर' उसको खोने के बाद ये ख़्याल आया
'इश्क़ लिखना वहशत थी और वो भी पानी पर
Read Full