मैं उन की निगाहों में जब देखता हूँ
तो यूँ लगता है उन के दिल की दवा हूँ
ये क्या इश्क़ से इस क़दर मैं जुड़ा हूँ
की जैसे मुकम्मल जहाँ से ख़फ़ा हूँ
मुझे मत सँभालो मैं पागल बना हूँ
न जाने कहाँ यादों में चल पड़ा हूँ
मुझे देखें ही मारों सब पत्थरों से
मैं बिन उस के जैसे कोई बद-दुआ हूँ
मुहब्बत मुहब्बत मुहब्बत मुहब्बत
मुकम्मल मैं इस लफ़्ज़ का हो गया हूँ
मुझे देखो तुम, मत डरो इश्क़ वालो
मैं सब हार के जीने का हौसला हूँ
किसी ग़ैर का ज़िक्र क्यूँ करता है तू
तुझे क्या नहीं इल्म भी मैं तिरा हूँ
कई इस से पहले भी बिछड़े थे मुझ से
उसे क्यूँ न खोने की ज़िद पे अड़ा हूँ
अगर जिस्म से उस के चाहत है मुझ को
तो फिर मास ख़ुद का ही मैं नोचता हूँ
या इस बार ये शख़्स मेरा या मैं ख़त्म
ऐ मेरे ख़ुदा तुझ को बतला रहा हूँ
बुरा हूँ या अच्छा हूँ चाहे जो भी हूँ
मगर उस हसीना के दिल का पता हूँ
वो घबरा के सीने से लग जाए मेरे
शब-ओ-रोज़ तरकीबें ये सोचता हूँ















