Aves Sayyad

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Aves Sayyad shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Aves Sayyad's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

कितना सुकून है तेरी बाहों में जान-ए-जाँ जी चाहता है मैं तुझे बाहों में बाँध लूँ — Aves Sayyad
अब दिखाते हैं आइना मुझ को बेतहाशा रुलाने वाले लोग — Aves Sayyad
गर तुम भी उस को देखने के बा'द ज़िंदा हो मतलब तुम्हें भी हुस्न का मतलब नहीं पता — Aves Sayyad
तिरंगा शान है मेरी तिरंगा जान है मेरी तिरंगा सब सेे ऊँचा हो यही पहचान है मेरी — Aves Sayyad
पैर के छालों में चुभते हैं हजारों काँटे फूल तब बाग में शायान हुआ करते हैं — Aves Sayyad
अपने टूटे फूटे ख़्वाबों की ता'बीर बनाता हूँ मैं बिखरे लफ्ज़ों से काग़ज़ पर तस्वीर बनाता हूँ — Aves Sayyad
वो भी टूटा हुआ था और ये भी हारी हुई थी दोनों इक दिन मिले थे कोई कहानी हुई थी — Aves Sayyad
यही बस इक हक़ीक़त है, मुझे तुम सेे मुहब्बत है मगर हम मिल नहीं पाए, ये अपनी कैसी क़िस्मत है — Aves Sayyad
ये मेरा इश्क़ नहीं गर तो क्या है जो ग़ज़लों में तू ही तू महकती है — Aves Sayyad
जितनी दुनिया बनाई है उस ने हम तो बिछड़े हर एक दुनिया में — Aves Sayyad
जीत कर जिस को सभी कुछ पा लिया मैं उसी की हार से मंसूब हूँ‌ — Aves Sayyad
इक दिए से बँध गई है मेरी साँस की रिदम, इक लकीर पर टिकी है मेरी ज़िंदगी की डोर — Aves Sayyad
ईद पर सब फूल ले कर आ रहे हैं हो गए हैं ज़िंदगी के ख़त्म रमज़ान — Aves Sayyad
इस लिए लड़ता है मुझ सेे मेरा दुश्मन उस का भी मेरे सिवा कोई नहीं है — Aves Sayyad
कितने ही लगे रंग ज़माने में सभी पर सब रंग छुपा लेती है आ कर यहाँ होली — Aves Sayyad
मैं सोच रहा बदले वो कुछ प्यार का मतलब यूँँ तो मुझे मालूम है इनकार का मतलब — Aves Sayyad
इस्तिफ़ादा, दाम, शोहरत, है न ख़्वाहिश शा'इरी से याद मेरा नाम तुम को रह गया, ये भी बहुत है — Aves Sayyad
तेरे सीने में रौशन हो मुहब्बत के दिए हर दम ले तू जाते हुए मेरा भी ये दिल साथ लेता जा — Aves Sayyad

Ghazal

हम को लगा था हुस्न के बीमार हो गए सच पूछिए तो इश्क़ में बे-कार हो गए हम रहनुमा थे हम से ही राहों में थी चमक हम कैसे तेरी राह की दीवार हो गए माज़ी की लग़्ज़िशें भी थी दिल भी था तार तार अपना ही ग़म निचोड़ के फ़नकार हो गए कितनी शिकायतें थी मगर हाए ये नसीब आख़िर को तुम ही मेरे ख़रीदार हो गए हम शान हैं किसी की किसी का श्रृंगार हैं हम ओढ़नी कहीं कहीं दस्तार हो गए दिल भी ये कैसे कैसे मनाज़िर का नाम है इक पल में आश्ना से जफ़ा-कार हो गए हम गाँव से निकल के यहाँ आ गए मगर इतनी सहूलतों में भी दुश्वार हो गए आँखों में नफ़रतें भी थी हाथों पे ख़ून भी हम ने सुना है लोग वे दीं-दार हो गए 'सय्यद' की पलकें अस्ल में 'सय्यद' की क़ैद थी जो अपने ख़्वाब-गाह में गुलज़ार हो गए — Aves Sayyad
गुज़रे तेरे करम से मसाइल कभी कभी कुछ में तो तेरा नाम था शामिल कभी कभी ये इल्तिजा है कर न तू आसान राह-ए-इश्क़ मुश्किल से मुझ पे आई है मुश्किल कभी कभी हर बात की वज़ह हो ज़रूरी नहीं है दोस्त ऐसे ही बैठ जाता है ये दिल कभी कभी ख़ुद को तू अपने ज़ब्त से बाहर निकाल ले दरिया भी खोल लेता है साहिल कभी कभी कुछ भी नहीं है पास तो खोने का डर नहीं फिर क्यूँ उँडेले मैं ने हलाहिल कभी कभी उस ने भी ग़ैर जान के पत्थर उठा लिए कालिख बना नक़ाब के क़ाबिल कभी कभी दिल चाहता है काट दूँ उस की ज़बान को देता है ऐसे ऐसे दलाइल कभी कभी मुझ को तो मिल सका न मेरे जैसा कोई और बैठा है आइना भी मुक़ाबिल कभी कभी सूरज को देखने का हुनर आप में नहीं बीनाई छीन लेती है मंज़िल कभी कभी 'सय्यद' दुआएँ बारिशें बन कर बरस रहीं बाग़-ए-जिनाँ से आया है बिस्मिल कभी कभी — Aves Sayyad
रंज-ओ-अलम के कोई मसाइल नहीं रहे जब ज़िंदगी में कोई मुमासिल नहीं रहे जो भी किया ब-शर्त वो अंजाम तक किया मारे गए प' तीर के घाइल नहीं रहे देखा करे रक़ीब ये हुस्न-ओ-अदा तेरी हम तो किसी गुनाह के क़ाइल नहीं रहे और बात उन के दिल से निकाले गए मगर वो भी हमारे नाम से कामिल नहीं रहे देखा है तेरे बा'द इन्हें रख के हर जगह ये दुख किसी बदन में भी शामिल नहीं रहे अब आँख भी निकाल दी चल वो दिखा मुझे जो ख़्वाब मेरी आँख के क़ाबिल नहीं रहे खेंची हैं उस ने कैसी ये दरिया में सरहदें इक दूसरे के जैसे हैं पर मिल नहीं रहे सय्यद किसी वजह से दरख़्तों से हो गए सय्यद किसी के हुक्म से हम हिल नहीं रहे — Aves Sayyad
कोई मकड़ी फँसी है बालों में निख़र आई सफ़ेदी जालों में क़हक़हा ख़ामुशी में बदला है ऐसे सन्नाटे गूंजे नालों में और हालत ख़राब होती है इश्क़ हो गर ख़राब हालों में तीरगी में मिला हूँ मुझ सेे मैं खो गया था तेरे उजालों में एक ही शख़्स पर झगड़ते हैं कैसी ख़ूबी है हम-ख़यालों में उस को चालें सिखाई हैं मैं ने मैं ही फँसता हूँ उस की चालों में कितनी आसाँ बना दी जाती है एक मुश्किल मेरे ख़यालों में पैर छू कर विदा किया उस ने ख़ुशबुएँ बस गई हैं छालों में मैं ने उलझा दिया जवाबों को सो वो खुलता गया सवालों में नज़्में ग़ज़लें हो जाती हैं 'सय्यद' शे'र होता है कोई सालों में — Aves Sayyad
आशुफ़्ता वहशतों को मुकद्दर बना दिया दुनिया की ठोकरों ने सुबुक-सर बना दिया लाइक़ तो खो गए हैं क़तारों की भीड़ में मुझ को सिफ़ारिशों ने सिकन्दर बना दिया हम दोनों हिज्र काटने आए हैं एक साथ दोनों को तेरे इश्क़ ने बे-घर बना दिया चीख़ों से कोई काम जो लाया न जा सका ख़ामोशियाँ समेट के लश्कर बना दिया आलम भी दोस्त आग की गर्दिश में क़ैद है सो दुश्मनों को राज़ का महवर बना दिया पैकर में इक धड़कता हुआ दिल था पर मुझे दफ़्तर की ख़्वाहिशात ने पत्थर बना दिया 'सय्यद' मेरे नसीब में कुछ भी नहीं रहा इक जिस्म बख़्शा उस को भी बे-सर बना दिया — Aves Sayyad
आँखों को उस के ख़्वाब का हासिल दिखाएँगे तुझ को सजा के ख़्वाब की ता'बीर लाएँगे बीनाई इंतिज़ार की सूरत बनेगी देख आँखों को इंतिज़ार के क़ाबिल बनाऍंगे वहशत से दूर रक्खेंगे हम अपनी दास्ताँ दुनिया को दोस्ती के मआ'नी बताएँगे इक रोज़ रहमतों को तेरे सर करेंगे हम इक रोज़ तेरे नाम का बादल बनाएँगे जो हम सेे आश्ना रहे हम उन की क़ब्र पर हर दिन दिया जलाएँगे आँसू बहाएँगे सहरा में आज़माई है उस ने इबादतें हम आने वाली नस्ल को ज़मज़म पिलाएँगे जितनी हसीन दिखती है उतनी नहीं है ये मिट्टी की काएनात को जन्नत बनाएँगे मफ़्हूम से ही जिस के ये दिल ख़ौफ़ खाता है 'सय्यद' वो इक ग़ज़ल भला कैसे सुनाएँगे — Aves Sayyad
नसीब पर हँसे कि रोए चल पड़े हम इस लिए भी साथ तेरे चल पड़े किसे दिखाते क्या लिखा है हाथ पर सो हाथ हाथ में छुपा के चल पड़े मलाल हो न ख़ामुशी का सीने में बस इस लिए ही महफ़िलों से चल पड़े शब-ए-फ़िराक़ हम सेे आशना रही तुम्हारा क्या है दिल को तोड़े चल पड़े किसी की ज़िंदगी बदल के आ गए किसी के रास्तों से हट के चल पड़े कहा जो उस ने कोई राब्ता नहीं ख़ुतूत उस के मुँह पे मारे चल पड़े न जाने किन हक़ीक़तों से दूर हैं न जाने हम कहाँ से फेंके चल पड़े जो उस के सारे झूठ सच बदल गए सो हम भी हल्का मुस्कुरा के चल पड़े अवेस तू सफ़र में कैसे आ गया हमारा क्या है चलते चलते चल पड़े सिफ़ारिशें भी दोस्तों की लग गईं कि सय्यद आज खोटे सिक्के चल पड़े — Aves Sayyad
कुछ सोच कर कहा है कि तेरा नहीं हूँ मैं तू चाहता है उतना तो अच्छा नहीं हूँ मैं मालूम है मुझे तू अभी किस के साथ है पागल हुआ हूँ पर अभी इतना नहीं हूँ मैं सड़को पे दर-ब-दर किया है तेरे इश्क़ ने पैरों में ग़म की गाँठ है बहका नहीं हूँ मैं यादों ने तेरी घर को परिंदों से भर दिया तन्हा किया था तू ने प' तन्हा नहीं हूँ मैं फिर तेरे बा'द यूँँ हुआ सिगरेट नहीं बुझी होंटों पे सुर्ख़ियाँ रहीं ज़िंदा नहीं हूँ मैं हाथों की तेरी चूड़ी हूँ जिस्मों की मैं रिदा पायल या तेरी बाली बता क्या नहीं हूँ मैं तू ने भी मेरे नाम से क्या क्या नहीं किया ये मेरा ज़र्फ़ है तुझे कहता नहीं हूँ मैं कितनी ही नेकियाँ मेरे काँधों पे दर्ज है कितनो का दिल रखा कभी गिनता नहीं हूँ मैं सय्यद मुझे तो हिज्र में सहरा नहीं मिला सय्यद दिवाना हो के भी भटका नहीं हूँ मैं — Aves Sayyad
मेरे कूचे से तजल्ली को चुराते हुए लोग ज़ुल्मत-ए-शब तेरी तासीर बढ़ाते हुए लोग लिए बैठे हैं तसव्वुर में कोई गहरा निशाँ सुर्ख़ अल्फ़ाज़ से तस्वीर बनाते हुए लोग तेरी गलियों में अकेला ही रहा था लेकिन अब नहीं देखते मुझ को यहाँ आते हुए लोग जिन की क़ब्रों पे कभी फ़ातिहा पढ़ता नहीं मैं मेरे माज़ी का वही क़िस्सा सुनाते हुए लोग मेरे जैसों को तो बाज़ार में आने न दिया रास्ता तेरे त'आक़ुब में सजाते हुए लोग हाफ़िज़ा मेरा सियह रात के मानिंद हुआ अब मुझे याद नहीं चाँद दिखाते हुए लोग ये इमारत ये रईसी ये मुक़द्दर और बात आ कभी देख ख़ूँ का रिज़्क़ कमाते हुए लोग ये जो क़ातिल हैं तेरे इन की तो चल ख़ैर नहीं पर तेरे नाम से हंगामा उठाते हुए लोग नींद दीवार पे लटका के रखी है 'सय्यद' और बिस्तर पे ख़्वाबों को नचाते हुए लोग — Aves Sayyad

Nazm

"तलाश" हम तो दीवार-ओ-दर से थे उलझे हुए हम ने चाहा था साँसों की सरगम बने हम ने चाहा था दीदार-ए-महबूब हो हम सदाएँ तेरे दर पे देते रहे रक़्स करते रहे गीत गाते रहे खोए खोए ख़लाओं से घिरते रहे वक़्त रखता है दामन में यादें तेरी इन हवाओं से आती है ख़ुशबू तेरी देखते देखते तेरी तस्वीर को चाँद तारों भरी तेरी ता'बीर से उलझे उलझे हैं तेरे ही मंज़र सभी हम ने आँखों से देखी है दुनिया तेरी हम निसाबों से घिर के अजाबों में हैं ये जहाँ तो है हम पे अजाब-ए-सफ़र तेरे कहने पे लेकिन निकल आए है तेरे कहने पे हम ने क्या कुछ किया तेरे कहने पे इक रोज़ मर जाएँगे पर जहाँ को है तेरी ज़रूरत बड़ी तू कहाँ है कहाँ है कहाँ है कहाँ — Aves Sayyad
नज़्म:- रील जब मैं अपनी ज़िंदगी की रील को पलट कर देखता हूँ, तो पाता हूँ, कुछ मंज़र हैं जो मैं ने खो दिए हैं, वो लोग जो मेरी ज़ात से मंसूब थे, मेरी ज़ात से आगे निकल गए हैं, वो लोग जिन को मैं ने लिखना सिखाया, वो अपनी कहानी से मुझ को मिटा चुके हैं, जिन के कासे भरे मैं ने दु'आओं से, वो नवाज़े गए तो मुझ ही को ख़ैरात करने लगे, हर वो शख़्स जिस को पलकों पर बैठाया मैं ने, मिज़्गाँ पे आते ही मेरी आँखें बंद कर दी, जब मैं अपनी ज़िंदगी की रील को पलट कर देखता हूँ, तो पाता हूँ, वो एक शख़्स, जिस सेे मैं ने बेइंतिहा मोहब्बत की, उसे लोग किसी और के तवस्सुत से जानते हैं, वो एक शाम जो मैं किसी पर उधार छोड़ आया था, उस का सूद अब कोई और खा रहा है, वो एक परीज़ाद जिस के होने पर नाज़ था मुझ को, वो दो आँखें जिन में ये ज़ीस्त बसर करनी थी, वो दोनों मेरे तमाम सानेहा की नाज़रीन थी, वो जिस के माथे को चूम कर मैं लौट आया था, जिस की ज़ुल्फ़ों के पेचो-ख़म में अपने यादें छोड़ आया हूँ, अपने कपड़ों में जिस की महक, जिस के होंटों की निशानी ले आया हूँ, वो एक शख़्स, जिसे सिर्फ़ मेरा होना था, मैं उसे न जाने किन उलझनों में छोड़ आया, जब मैं अपनी ज़िंदगी की रील को पलट कर देखता हूँ, तो पाता हूँ, कुछ साल पहले तक, कुछ दोस्त थे मेरे, मेहकशों की टोली थी, अकड़ कर चलते थे, एक दूसरों के ग़म के साथी थे, वो गुलदस्ता अब बिखर चुका है, हर एक फूल मुरझा गए हैं, वो हँसते गाते चेहरे गूँगे पड़े हैं, वो तार जिन में कभी सरगम थी, तार तार हो कर बिखर चुके हैं, वो आँखें जिन में आने वाले मंज़र थे, माज़ी के पन्नों तले दफ़न पड़े हैं, जब मैं अपनी ज़िंदगी की रील को पलट कर देखता हूँ, तो पाता हूँ कि हर जगह बस मैं ही मैं था, इन महफ़िलों में था, वीरानियों का साथी मैं था, मैं ने ही सहराओं में गीत गाए हैं, मैं ही नहाएा पत्थरों की बारिश में, चाँद की तन्हाई का साथी, सितारों को महफ़िल में रौशन, सूरज की आग को हवा देता, बर्फीले पहाड़ों को था में हुए, इन समंदरों को अपनी जगह रोके हुए, इन नदी दरियाओं को मिलता हुआ, सब को मंज़िल पर पहुँचता हुआ, तन्हाइयाँ सबकी मिटाता हुआ, मैं ही तो था, हर जगह बस मैं ही तो था, मैं ने ही चीरा नील को भी, मैं ही ज़िंदा था मछली में, आब-ए-जमजम मेरा मुक़द्दर, मैं ही लटका सूली पर, कर्बला में मैं ही कटा, मैं ने ही चाँद को काटा, मैं ही था सब सेे पहले, जन्नत थी मेरी जागीर, कुछ नहीं बचा, कुछ नहीं रहा, ये फ़िल्म भी अब ख़त्म हो रही है, रील भी पूरी हो चुकी है, साँस भी अब रुक गई है, मगर मैं फिर भी पलट पलट कर देख रहा हूँ अपनी ज़िंदगी की रील को, और मैं पाता हूँ कि मैं ने बहुत कुछ खो दिया है, मैं ने सब कुछ खो दिया है। — Aves Sayyad
"ख़्वाबों की तन्हाई" क्या तुम्हें नींद आती है? क्या तुम्हें ख़्वाब आते है? क्या तुम रातों को सो जाती हो? मैं? नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकता मेरी तो नींद तुम्हारी है ना मेरे तो ख़्वाब भी तुम्हारे है ख़ैर अब इन ख़्वाबों में एक तन्हाई है तन्हाई? हम्म्म, अच्छा तन्हाई क्या है? तुम नहीं जानती? हाँ, तुम तो ख़्वाब देखने वाली हो ना तुम ने मेरे कमरा भी तो नहीं देखा ये बिस्तर ये दीवारें किताबें अधूरी जली सिगरेट चाय के छींटों से भरे कप ये बेवजह शोर करता हुआ फेन ये टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक टिक, टिक टिक टिक टिक ! ये टिक टिक करती घड़ी जो मौत के आने की ख़बर देती है ये बिस्तर के चारों तरफ़ फैला सन्नाटा ये खिंडकियों से झाँकता धूप का ख़ाली-पन ये मोबाइल जो आधे वक़्त अब बंद ही रहता है तेरे बा'द किसी से बात नहीं की मैं ने अब कोई मुझे भी कॉल नहीं करता ये मोबाइल लाश के जैसे बिस्तर पर पड़ा है किसी रोज़ इस का भी जनाज़ा उठायेंगे ख़ैर छोड़ो ये सब ये क्यूँ किसी की आँखों में ख़्वाब नहीं है क्यूँ किसी के ख़्वाबों में बस आँखें है अरे तुम भी ना! छोड़ो ये सब मैं तुम्हें क्या बता रहा था वैसे? हाँ तन्हाई! तन्हाई सुकून से बनी वो बेतरतीब शह है जो कुन की यकताई का मौजज़ा है ख़्वाबों का सन्नाटा सुना है? उस सन्नाटे को समेट कर एक पेकर में डालो तब जा कर तन्हाई बनती है, चाय से भरे ठंडे कप देखे है? हाँ, वो ठंड तन्हाई है, तुम ने सुना है परिंदों की चह-चहाहट? उन के परों का फड़-फड़ाना? क्या तुम ने बादल आते देखें हैं? क्या तुम ने देखा है केसे कोई बूँद अपने जिस्म की रूह को छोड़ कर ज़मीं की तरफ़ दौड़ी चली आती है? क्या तुम ने देखा है केसे वो बूँद ज़मीं पर गिर कर उसी की हो कर रह जाती है, तुम ख़्वाब देखती हो ना? चलो तो फिर बताओ क्या क्या देखती हों? क्या देखा है तुम ने किसी रूह से उस के दिल का निकल जाना? क्या देखा है तुम ने रक़्स करता हुआ हिज्र? क्या देखा है तुम ने क़ैस को समुंदर पर चलते? क्या देखा है तुम ने कुन के बा'द किसी का न बनना? क्या देखा है तुम ने उन हक़ीक़तों को जो हक़ीक़त से दूर है? क्या देखा है तुम ने टूटी पत्तियों का फिर से शाखों पर चले जाना? क्या देखा है तुम ने आँसुओं से आँखों का बहना? क्या देखा है तुम ने उन गुलदस्तों को जो माज़ी को समेट कर बनाए गए? क्या देखा है तुम ने तारों को आसमाँ से ख़ाली होते? क्या देखा है तुम ने केसे हँसते हँसते कोई दर्द छुपाता है? क्या देखा है तुम ने फूलों को किताबों में लाल होते? क्या देखा है तुम ने लाल लहू का सफ़ेद होना? क्या देखा है तुम ने सड़क पर दुपट्टा लेते हुए डर को चलते? क्या देखा है तुम ने एक जिस्म का दूसरे जिस्म का शिकार होते? क्या देखा है तुम ने सड़क किनारे उस तीन फीट की ज़िंदा मूर्ति को जिस की आँखें बंद कर दी गई हैं? क्या देखा है तुम ने उन के हाथ काट दिए गए हैं और पैर न जाने किस नाले में बह रहे हैं? क्या देखा है तुम ने एक पत्थर का ख़ुदा हो जाना? क्या देखा है तुम ने एक ख़ुदा का पत्थर हो जाना? क्या देखा है तुम ने सड़क किनारे झपकते लाइट के नीचे देश का मुकद्दर पलते? क्या देखा है तुम ने पाँच सितारा होटल में भारी प्लेट छोड़ आना? क्या देखा है तुम ने सड़क पर एक रोटी पर दो ख़ून का बहना? क्या देखा है तुम ने सियासत को मज़हब से हटा कर? क्या देखा है तुम ने मोहब्बत को सियासत से हटा कर? क्या देखा है तुम ने लगे हुए पोधो का सुख जाना? क्या देखा है तुम ने मौत ज़िंदगी से ज़्यादा ख़ूब-सूरत है? क्या क्या क्या? ये सब नहीं देखा! मतलब तुम ख़्वाब नहीं देखती तुम्हें नहीं पता ख़्वाबों का दर्द कैसा है ये तपती रेत पर नंगे पाँव चलने का दर्द ये बारिशों में एक जगह खड़े रहने का दर्द ये धूप में जलते शजर, ये शजर से लिपटी परिंदों की लाश ये समुंदर किनारे प्यास से मर जाने का दुख ये समुंदर की हिफाज़त करते किनारे, ये किनारों पर तैनात दरख़्त ओर फिर उन के सर चढ़ कर नाचती धूप अगर ये सब नहीं देखती तो पिक्चर देखती हो तुम सच मानो ख़्वाब नहीं देखती हो तुम अरे रुको रुको हाँ यहीं, बस यहीं! रुको रुको रुको बस यहीं रुको और देखो वो दूर से आता ज़िंदगी का ग़म वो ग़म अब तुम्हें भी सोने नहीं देगा ख़ैर! मैं तुम सेे कुछ पूछ रहा था? हाँ, मैं ये पूछ रहा था के क्या तुम्हें नींद आती है क्या तुम्हें ख़्वाब आते है क्या तुम रातों को सो जाती हो मैं? नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकता मैं ने बताया ना! मेरी तो नींद तुम्हारी है मेरे ख़्वाब भी तुम्हारे है ख़ैर अब इन ख़्वाबों में एक तन्हाई है तन्हाई, तन्हाई, तन्हाई तन्हाई? हम्म ख़ैर छोड़ो ये सब और बताओ कैसी हो तुम? — Aves Sayyad
"इज़हार" ज़िंदगी तेरे सिवा सोचूँ क़यामत है मुझे हासिल-ए-कुन की क़सम तेरी ही चाहत है मुझे साथ इक उम्र गुज़ारी है मगर तू ही बता जान-ए-जाँ कैसे बताऊँ के मोहब्बत है मुझे तेरे साए में मेरी जान रहा करते हैं तब कहीं जा के यहाँ फूल खिला करते हैं तू जो अँगड़ाई भी ले ले तो फ़ज़ा बहके है तेरी पलकों पे ये महताब हुआ करते हैं गर नज़र भर के तुझे देख ले दुनिया वाले जान-ए-मन तेरी ही यादों में जिया करते हैं तेरा ही नाम लिए जाने की आदत है मुझे जान-ए-जाँ कैसे बताऊँ के मोहब्बत है मुझे तेरे ज़ुल्फ़ों की हँसी छाँव तले बैठा हूँ तेरी ख़ुशबू से मैं तस्वीर बना लेता हूँ तेरी पायल की खनक क़िस्मतों की चाबी है मेरी क़िस्मत तेरे साए में जिया करता हूँ तू अगर साथ रहे दामन-ए-गुलशन के लिए होंठ शबनम से लगा कर मैं पिला सकता हूँ तू गुमाँ कर ले जो वो बात हक़ीक़त है मुझे जान-ए-जाँ कैसे बताऊँ के मोहब्बत है मुझे वक़्त फूलों का निगहबान बना बैठा था मैं भी गुलशन से हवाओं की तरह गुज़रा था तेरी मुस्कान के सदक़े ही मेरी दुनिया थी तेरे होंटों पे दुआ बन के रहा करता था तेरे गेसू तेरे रुख़्सार का क़ैदी था मैं उम्र भर हाथ तेरा थाम के मैं ज़िंदा था क्या तुझे दिल से लगाने की सहूलत है मुझे जान-ए-जाँ कैसे बताऊँ के मोहब्बत है मुझे ज़िंदगी तेरे तआक़ुब की कहानी है मेरी तेरी धड़कन से ही ग़ज़लों में रवानी है मेरी तेरा काजल तेरी पायल तेरी चूड़ी तेरा नथ उम्र-ए-आख़िर में सजी ऐन-जवानी है मेरी ये किताबों सा बदन आँख की स्याही से लिखूँ या कहूँ तुझ को मोहब्बत ही बढ़ानी है मेरी कुछ भी तुझ सेे न तेरे हुस्न से वहशत है मुझे जान-ए-जाँ कैसे बताऊँ के मोहब्बत है मुझे — Aves Sayyad
"दीवानी बातें" मेरे कमरे में अक्सर ही ये यादें रक़्स करती है कभी दोस्ताँ बुलाए गर तो मैं घर से निकल आऊँ मचाऊँ शोर बाहर आ सुनाऊँ तुझ को हाल-ए-दिल जो कहता मूँद ले आँखें दिखाऊँ ख़्वाब फिर तुम को कहीं सन्नाटे में बैठा है तमाशा हँस के देखें हैं न करना ज़ेहन की बातें न समझे कुछ न जाने हैं मेरे ख़यालों के ये बच्चे सभी पागल दिवाने हैं झपक ली पलकें उस पर गर जी को कैसे सँभालेंगे मेरे गालों पे लाली है तेरे होंटो की ख़्वाहिश में जो ये मेरा मुकद्दर है गुमाँ है या हक़ीक़त है मोहल्ला दिल का है वीराँ तेरी पर याद महके हैं इसी महकी सी स्याही से लिखी दीवानी क़िस्मत है मेरी आँखें बोझल हैं कुछ बड़ी नाशाद पलकें हैं मेरे माथे कि सिलवट में तू क्या तक़दीर ढूँढ़े हैं है इस का ख़्वाब इतना सा तू सीने से आ लग जाए मेरे काँधे से लग कर रो मेरी आँखों में देखे फिर जो ये ख़्वाबों के मंज़र हैं समेटे दर्द आहों में सँभाले ज़ख़्म माज़ी के तेरी यादों के पैकर में हैं तस्वीरें पुरानी कुछ मेरा पागल सा दिल है इक धड़क कर शोर करता है घरों की खिड़की मानो जूँ हवा से नाचें गाए हैं किसी जंगल का कोई पेड़ जूँ बिजली चूम कर आए मुसाफ़िर जो भटक जाए नई इक राह को पाए तू आँसू देख आँखों के मचाए शोर पीड़ा में ये बहते आँसू के दरिया किसी साहिल पे बैठें हैं तेरी महताब सूरत को सँवारे अपने शाने पर मैं भी पत्थर की मूरत बन किनारे पर आ बैठा हूँ तुझे देखूँ मैं छत पर से तेरा ही अक्स दरिया में इसी उम्मीद को बाँधे मैं अपने घर की चौखट पर जमाए आँख बैठा हूँ दिवाना हूँ, दिवाना मैं दिवाने जैसी बातें हैं न जाने ज़ेहन में क्या क्या दिवाने ख़्वाब बुनता हूँ न सुन लेना मेरी नज़् में सभी बचकानी बातें हैं बहुत उलझा सा लड़का हूँ बहुत उलझी सी बातें हैं ख़मोशी ज़ेहन ‌की ओढ़े मैं कुछ भी बकता रहता हूँ ये बस अपना फ़साना है ये बस अपनी हक़ीक़त है न है तुझ से गिला कोई अब न अब तुझ से शिकायत है मैं पागल जैसा लड़का हूँ यूँँ ही मस्ती में रहता हूँ जो भी मैं कहता हूँ तुम सेे न इस पर ध्यान देना तुम हाँ तो कुछ बात ऐसी है मुझे तुम से मोहब्बत है — Aves Sayyad