सात जन्मों की हुआ करती थी नेमत
सात दिन में ही सिमट आई मुहब्बत
तुम मेरे यारों से ज़्यादा हो रकी़बों
जाने क्यूँ उसको बनाया ख़ूबसूरत
दिन के छप्पन कॉल फिर मैसेज दो सो
यार ये हर रोज़ क्या है तेरी आफ़त
'उम्र भर इक शख़्स को ही चाहा मैंने
मेरे जैसों से नहीं लेते हिदायत
ब्लॉक हूँ मैं, बात कैसे होती तुझ से
क्या ख़बर, तुझ को भला, क्या है शिकायत
जॉब तेरी, दोस्त तेरे, सब गए तो
अब लगा दो इस की भी मुझ पर ही तोहमत
चार दिन में हो गया है तू किसी का
माँगी थी मैंने महीने की तो मोहलत
तू पलट के आए तो ये याद रखना
मैं ही सय्यद हूँ, थी जिसकी फूटी क़िस्मत
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