जहाँ की सरफ़रू में मर गए थे हम
यहाँ यूँँ फ़ालतू में मर गए थे हम
उसी के रूबरू थे 'उम्र भर और फिर
उसी की जुस्तजू में मर गए थे हम
सर-ए-तुर्बत हमारी रक़्स कर बैठा
वो जिस से गुफ़्तुगू में मर गए थे हम
लगा कर ख़ुदकुशी के फूल गमले में
ख़ुद अपने हाव-हू में मर गए थे हम
किसी के 'इश्क़ ने ज़िंदा किया हमको
किसी की आरज़ू में मर गए थे हम
कोई होगा, हँसी जिसको मुयस्सर है
लबों की आबरू में मर गए थे हम
कभी यूँँ भी थे निकले हज़रत-ए-सय्यद
कि उनकी रंग-ओ-बू में मर गए थे हम
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