बना रखता यूँँ तो वो दिल को पत्थर है
मगर मुझ को तो कहता आप का घर है
वो लड़की इक तो बेहद ख़ूब-सूरत है
कमर का उस का तिल ऊपर से सुंदर है
मैं उस से मिलने को बेताब रहता हूँ
किलोमीटर मगर सौ पूरे पर घर है
मुहब्बत के हमारी क्या ये मंज़र हैं
कभी गुल तो कभी हाथों में ख़ंजर है
यहाँ तय्यार हूँ मैं मरने को या रब
खड़ा लेकिन कहाँ तो उस का लश्कर है
हैं हम घाइल न छेड़े कोई भी हम को
हमारे सीने में लौ आँख ख़ूँ तर है
गुज़ारिश लोग करते उन पे लिखने की
मगर ये 'दीप' बस तेरा ही शाइ'र है
सँभालूँ किस को मैं किस को कहाँ रक्खूँ
ये तर्ज़-ए-इश्क़ मेरी ज़ीस्त अबतर है
फ़क़त बर्बाद था मैं हूँ रहूँगा भी
चलों मत साथ तुम मेरे तो बेहतर है















