
निगाहों के सागरों से पानी छलक न जाए कहीं हमारा
अज़ाब-ए-दिल पे न रोने का टूट ये न जाए यक़ीं हमारा
तो शोख़ी तो देखो उन की वो बस हमारे ही वास्ते हैं ऐसे
वो चारा-गर बन गए हैं अब पर इलाज करते नहीं हमारा
— Deep kamal panecha
Other sher from the same pen
Shers of nazakat.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling