हमें दुख की हद तक गुज़ारा गया है
बिना आँसू ही रोज़ मारा गया है
तुम्हें क्या बताए हमीं को न जब इल्म
हमें क्यूँ दुबारा पुकारा गया है
हमें मौत की चाह होने लगी है
उन्हें गैर ख़ातिर सँवारा गया है
गिला क्यूँ करें हम जहाँ वालों से जब
किसी को उन्हीं से इशारा गया है
हमें छोड़ के जाए हर शख़्स याँ का
हमें इस लिए यूँ निखारा गया है
किसी ग़ैर का ज़िक्र पहलू हमारे
ये दिल है हमारा जो मारा गया है
मैं जब काम कर के निकलता हूँ सब का
यही कहते फिर भी नकारा गया है
— Deep kamal panecha















