जाने कितनी शबें जगा हूँ मैं
नींद को बतला दो ख़फ़ा हूँ मैं
पूरी शब सोच में गुज़रती है
क्यूँ फ़क़त तुम को सोचता हूँ मैं
ज़िन्दगी जीना थोड़ा तो सिखा दें
देख,अरसे से मर रहा हूँ मैं
दिल में कोई मुझे नहीं रखता
जी यक़ीनन बहुत बुरा हूँ मैं
आप कोशिश न जानने की करें
जीते जी मरने की अदा हूँ मैं
और नफ़रत से देखो तुम मुझ को
मेरी जान-ए-जिगर तिरा हूँ मैं
ज़ख़्मों से इतना प्यार है मुझ को
बे-सबब ज़ख़्म ढूँढ़ता हूँ मैं
ज़िंदा हो जाऊँ, गर वो आए पलट
वर्ना ऐसे मरा हुआ हूँ मैं
इस क़दर इश्क़ है मुझे उस से
चिल्ला चिल्ला के बोलता हूँ मैं
उस से अपना कोई नहीं मेरा
वास्ते उस के दूसरा हूँ मैं
सारे नफ़रत ही करते है मुझ से
हाए रब की हसीं ख़ता हूँ मैं















