har dhadakte patthar ko log dil samjhte hain | हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं

  - Bashir Badr

हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में

  - Bashir Badr

Aadmi Shayari

Our suggestion based on your choice

    हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
    जिस को भी देखना हो कई बार देखना
    Nida Fazli
    37 Likes
    शरीफ़ इन्सान आख़िर क्यों इलेक्शन हार जाता है
    क़िताबों में तो ये लिक्खा था रावन हार जाता है
    Munawwar Rana
    37 Likes
    वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है
    माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है

    वो कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तुगू
    मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है
    Read Full
    Dushyant Kumar
    49 Likes
    मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों
    तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं
    Meer Taqi Meer
    16 Likes
    कान्हा होंगे लोग वहाँ के राधा होंगी बालाएँ
    प्यार की बंसी बजती होगी हर समय हर ठाओं रे
    Ghaus Siwani
    20 Likes
    मिरी ज़बान के मौसम बदलते रहते हैं
    मैं आदमी हूँ मिरा ए'तिबार मत करना
    Asim Wasti
    26 Likes
    इसी लिए तो यहाँ अब भी अजनबी हूँ मैं
    तमाम लोग फ़रिश्ते हैं आदमी हूँ मैं
    Bashir Badr
    29 Likes
    जो लोग खुद न करते थे होंठों से पान साफ़
    पलकों से कर रहे हैं तेरा पायदान साफ़
    Charagh Sharma
    29 Likes
    मिरे किरदार! जाने दे नज़रअंदाज कर दे
    ख़ुदा की फ़िल्म है ये आदमी से क्या शिकायत
    Vikram Sharma
    25 Likes
    अपनी हस्ती का भी इंसान को इरफ़ांन हुआ
    ख़ाक फिर ख़ाक थी औक़ात से आगे न बढ़ी
    Shakeel Badayuni
    20 Likes

More by Bashir Badr

As you were reading Shayari by Bashir Badr

    मुझे मालूम है उस का ठिकाना फिर कहाँ होगा
    परिंदा आसमाँ छूने में जब नाकाम हो जाए
    Bashir Badr
    38 Likes
    मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
    किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी
    Bashir Badr
    59 Likes
    पहला सा वो ज़ोर नहीं है मेरे दुख की सदाओं में
    शायद पानी नहीं रहा है अब प्यासे दरियाओं में

    जिस बादल की आस में जोड़े खोल लिए हैं सुहागन ने
    वो पर्बत से टकरा कर बरस चुका सहराओं में

    जाने कब तड़पे और चमके सूनी रात को फिर डस जाए
    मुझ को एक रुपहली नागिन बैठी मिली है घटाओं में

    पत्ता तो आख़िर पत्ता था गुंजान घने दरख़्तों ने
    ज़मीं को तन्हा छोड़ दिया है इतनी तेज़ हवाओं में

    दिन भर धूप की तरह से हम छाए रहते हैं दुनिया पर
    रात हुई तो सिमट के आ जाते हैं दिल की गुफाओं में

    खड़े हुए जो साहिल पर तो दिल में पलकें भीग गईं
    शायद आँसू छुपे हुए हों सुब्ह की नर्म हवाओं में

    ग़ज़ल के मंदिर में दीवाना मूरत रख कर चला गया
    कौन उसे पहले पूजेगा बहस चली देवताओं में
    Read Full
    Bashir Badr
    नज़र से गुफ़्तुगू ख़ामोश लब तुम्हारी तरह
    ग़ज़ल ने सीखे हैं अंदाज़ सब तुम्हारी तरह

    जो प्यास तेज़ हो तो रेत भी है चादर-ए-आब
    दिखाई दूर से देते हैं सब तुम्हारी तरह

    बुला रहा है ज़माना मगर तरसता हूँ
    कोई पुकारे मुझे बे-सबब तुम्हारी तरह

    हवा की तरह मैं बे-ताब हूँ कि शाख़-ए-गुलाब
    लहकती है मिरी आहट पे अब तुम्हारी तरह

    मिसाल-ए-वक़्त में तस्वीर-ए-सुब्ह-ओ-शाम हूँ अब
    मिरे वजूद पे छाई है शब तुम्हारी तरह

    सुनाते हैं मुझे ख़्वाबों की दास्ताँ अक्सर
    कहानियों के पुर-असरार लब तुम्हारी तरह
    Read Full
    Bashir Badr
    मैं तुम को भूल भी सकता हूँ इस जहाँ के लिए
    ज़रा सा झूट ज़रूर है दास्ताँ के लिए

    मिरे लबों पे कोई बूँद टपकी आँसू की
    ये क़तरा काफ़ी था जलते हुए मकाँ के लिए

    मैं क्या दिखाऊँ मिरे तार तार दामन में
    न कुछ यहाँ के लिए है न कुछ वहाँ के लिए

    ग़ज़ल भी इस तरह उस के हुज़ूर लाया हूँ
    कि जैसे बच्चा कोई आए इम्तिहाँ के लिए
    Read Full
    Bashir Badr

Similar Writers

our suggestion based on Bashir Badr

Similar Moods

As you were reading Aadmi Shayari Shayari