तू मुझ से उठ के भी सिर्फ़ मुझ तलक जाए

इस
में न तू कहीं दुनिया में भटक जाए

मैं तेरे हुक्म से इक दुआ ये लूँ क्या माँग
तेरी ख़ुशी मिरी बाहों में अटक जाए

मैं जब मरूँ तो मेरे गले न लगते तुम
धड़कन कहीं न ये मेरी फिर धड़क जाए

मैं उम्र भर फिरूँ ढूँढ़ता ख़ुशी मेरी
मेरी ख़ुशी तिरी ज़ुल्फ़ों में भटक जाए

बरसाता मैं ही बस कब तलक रहूँगा प्यार
दो बूँद तेरी आँखें से भी झलक जाए

वो मेरी मूँछ का काश रख ले थोड़ा मान
उस लड़के से जरा दूर उठ सरक जाए

बैठा रहूँगा अपना कलेजा था
में मैं
वो गीली ज़ुल्फ़ें गर चेहरे पर झटक जाए

जानाँ निकाल लो मेरी जाँ इजाज़त है
लेकिन कभी मिरे इश्क़ पे न शक जाए

इस बार थोड़ा सा भी बहक न जाना तुम
तुम को सँभालते "दीप" ये न थक जाए

— Deep kamal panecha

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