raahon mein jaan ghar mein charaagon se shaan hai | राहों में जान घर में चराग़ों से शान है

  - Obaid Azam Azmi

राहों में जान घर में चराग़ों से शान है
दीपावली से आज ज़मीन आसमान है

  - Obaid Azam Azmi

Mehboob Shayari

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    इसी से जान गया मैं कि बख़्त ढलने लगे
    मैं थक के छाँव में बैठा तो पेड़ चलने लगे

    मैं दे रहा था सहारे तो इक हुजूम में था
    जो गिर पड़ा तो सभी रास्ता बदलने लगे
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    Farhat Abbas Shah
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    इक ये भी तो अंदाज़-ए-इलाज-ए-ग़म-ए-जाँ है
    ऐ चारागरो दर्द बढ़ा क्यूँ नहीं देते
    Ahmad Faraz
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    इक और इश्क़ की नहीं फुर्सत मुझे सनम
    और हो भी अब अगर तो मेरा मन नहीं बचा
    Afzal Ali Afzal
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    न खाओ क़समें वग़ैरा न अश्क ज़ाया करो
    तुम्हें पता है मेरी जान हक़-पज़ीर हूँ मैं
    Amaan Haider
    जाँ हम दोनों साथ में अच्छे लगते हैं
    देखो शेर मुकम्मल अच्छा लगता है
    Neeraj Neer
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    तुम्हें हुस्न पर दस्तरस है मोहब्बत वोहब्बत बड़ा जानते हो
    तो फिर ये बताओ कि तुम उस की आँखों के बारे में क्या जानते हो

    ये जुग़राफ़िया फ़ल्सफ़ा साईकॉलोजी साइंस रियाज़ी वग़ैरा
    ये सब जानना भी अहम है मगर उस के घर का पता जानते हो
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    Tehzeeb Hafi
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    वही शागिर्द फिर हो जाते हैं उस्ताद ऐ 'जौहर'
    जो अपने जान-ओ-दिल से ख़िदमत-ए-उस्ताद करते हैं
    Lala Madhav Ram Jauhar
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    बस यूँ ही मेरा गाल रखने दे
    मेरी जान आज गाल पर अपने
    Jaun Elia
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    यूँ तो रुस्वाई ज़हर है लेकिन
    इश्क़ में जान इसी से पड़ती है
    Fahmi Badayuni
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    इश्क़ माशूक़ इश्क़ आशिक़ है
    यानी अपना ही मुब्तला है इश्क़
    Meer Taqi Meer
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More by Obaid Azam Azmi

As you were reading Shayari by Obaid Azam Azmi

    ऐसी तहरीर का उन्वान नहीं होता है
    ख़ैरियत लिखना कुछ आसान नहीं होता है

    इश्क़ में आए ख़सारे का करें क्या अफ़सोस
    कौन से काम में नुक़्सान नहीं होता है

    इश्क़ का रोग अजब है कि नहीं मरता कोई
    और बचने का भी इम्कान नहीं होता है
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    Obaid Azam Azmi
    हर गाम तेरे इश्क़ का इकरार है मैं हूँ
    ज़ंजीर है ज़ंजीर की झनकार है मैं हूँ

    ऐ ज़ीस्त जो सबसे बड़ी फ़नकार है तू है
    और तुझसे बड़ा वो जो अदाकार है मैं हूँ
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    Obaid Azam Azmi
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    दीवार उठाने की तिजारत नहीं आई
    दिल्ली में रहे और सियासत नहीं आई

    बिकने को तो दिल बिक गया बाज़ार में लेकिन
    जो आप बताते थे वो क़ीमत नहीं आई
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    Obaid Azam Azmi
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    कहाँ से चला था निग़ाहों में क्या था कहाँ जा रहा था मुझे सोचने दो
    मेरा साज़ क्या था मेरी तर्ज़ क्या थी मैं क्या गा रहा था मुझे सोचने दो
    Obaid Azam Azmi
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    इक तवाज़ुन को बिगाड़ा नहीं जा सकता है
    घर किसी का हो उजाड़ा नहीं जा सकता है

    और गाड़ी कोई उसके लिए लानी होगी
    कार में इतना कबाड़ा नहीं जा सकता है

    जो सज़ा उसकी हो दे दीजिए उसको इक दिन
    रोज़ मुजरिम को लताड़ा नहीं जा सकता है

    कल ये कानून भी आ सकता है शेरों के लिए
    बे-इजाज़त के दहाड़ा नहीं जा सकता है

    दौर-ए-मजनूँ की मोहब्बत में सुहूलत थी बहुत
    अब गिरेबान को फाड़ा नहीं जा सकता है

    गर्म जज़्बात की आँच और है दरकार ओवैद
    इतनी गर्मी से तो जाड़ा नहीं जा सकता है
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    Obaid Azam Azmi

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