"पुराना ज़ख़्म"

आज बरसों बा'द उन का दीदार हुआ
दिल को फिर इश्क़ पे ए'तिबार हुआ
आँखों में नए ख़्वाब जगे हैं
अभी भी अरमानों के दाग़ हरे हैं
एक तरफ़ा मुहब्बत यूँ शादाब भी होती है
मुकम्मल न हो तो भी आबाद भी होती है
उन की ज़ुल्फ़ों के साए मैं क़ैद रहे
ये दिल मेरा दिन-ओ-रात बेचैन रहे
मैं चाहता हूँ मोहब्बत का घर हो
उन की निग़ाहों का जादुई असर हो
उन की हसरत उन का अरमान हो
उन की ज़ुल्फ़ों का आसमान हो
हम दोनों हम-आग़ोश हो
किसी को न ज़माने का होश हो
ये चाँदनी रात हो हाथों में हाथ हो
हल्की हल्की इश्क़ की बरसात हो
इस की कभी सुब्ह न होने पाए
ग़म कभी हमारे घर न आए
मैं अपनी उँगलियों को उन के गुलाबी
रुख़सारों पे फहराऊँ
ख़ुदा करें मैं इस ख़्वाब-ओ-ख़्याल से
कभी बाहर न आऊँ
उन के एक पल के दीदार में
मैं ने इतना कुछ सोच लिया
आज फिर दिल के पुराने
ज़ख़्म को ख़रोंच लिया

— Deep kamal panecha

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