रुख़ हवाओं का तूफ़ानों का मोड़ चलते हैं
इश्क़ वाले दुनिया की रस्में तोड़ चलते हैं
हाए शा'इरी करना इतना सहल थोड़ी है
मौत से ये शाइ'र ख़ुद को ही जोड़ चलते हैं
कितने ग़म मिले हैं मुझ को सभी का दिल रख के
सब के दिल को, जो ख़ुश रहते हैं तोड़ चलते हैं
तो हमारे नज़दीकी हो गए जुदा हम से
तो ये ज़िंदगानी फिर हम भी छोड़ चलते हैं
रुख़्सती से पहले दामन पे जानाँ के ए "दीप"
अपनी आँखों के सारे ग़म निचोड़ चलते हैं
— Deep kamal panecha















