"बीच राह"
सर्द मौसम और ये राहें अकेली
और कब तेरी ज़रूरत होगी सहेली
मैं चलता चलता हाथ फैलाता हूँ
तेरा हाथ मेरे हाथ में नहीं पाता हूँ
फिर होश में आता हूँ घबराता हूँ
बीच राहों में रुक के बैठ जाता हूँ
कुछ सोच कुछ ख़याल आते रहते हैं
ज़िन्दगी के सारे मलाल आते रहते हैं
बैठा-बैठा इंतिज़ार करता हूँ
तेरा ज़िक्र बार-बार करता हूँ
रुक सा गया हूँ थम सा गया हूँ
अब तो ख़ुद को भी खो चुका हूँ
रोने के लिए आँख में आँसू नहीं
पर गला मेरा ख़ूब चीख़ता है
तू ही बतला दे मुझ को ऐ सहेली
ये दर्द नहीं आख़िर तो और क्या है
गर्दन बीच घुटनों में हौसला पस्त
और तू वहाँ बैठा है हो के मस्त
मैं किसी को ख़बर कर भी नहीं सकता
बीच सारे राह में मर भी नहीं सकता
ये ज़िंदगी का सफ़र है और मौत मंज़िल
तय तो हर हाल में करना पड़ेगा
और तेरे बग़ैर ऐ सहेली मुझे मंज़िल
पाने के वास्ते अभी मरना पड़ेगा















