"मुलाक़ात"

पहली मुलाक़ात में खामियाँ थी
कुछ क़िस्से थे कुछ कहानियाँ थी
तुम्हें पता था कि हम हैं
हसीं होने वाले कुछ ग़म हैं

ज़रा तो सज सँवर कर आती
जान काश कुछ पल और ठहर जाती

तेरे दिल में सवालो के काफिले थे
मुझे भी ज़वाब उन के कहाँ मिले थे
तेरे ज़ेहन को तसल्ली नहीं मिली होगी
हाँ मेरे ज़वाबो में ही कमी कोई रही होगी

उस के बा'द कही तो नज़र आती
जान काश कुछ पल और ठहर जाती

कुछ मैं ने फरमाया था कुछ आपने इतराया था
तेरे हर सवाल पे दिल एक बार तो घबराया था
बे-मतलब फ़ुज़ूल ही हम इस दुनिया से डरते है
छुप-छुप कर इक दूसरे के ख्यालो में मिलते है

थोड़े से और वक़्त पे मुलाक़ात निखर आती
जान काश कुछ पल और ठहर जाती

कमियाँ किस शख़्स में नहीं होती
तुझ
में नहीं होती या मुझ
में नहीं होती
शायद तुझे मैं अपना बना लेता
कुछ अधूरे से सपने सजा देता

इक बार तो मेरे ख़्वाबों के घर आती
जान काश कुछ पल और ठहर जाती

— Deep kamal panecha

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