"मैं तो तबाह सा हो जाऊँगा"

तुम से जुदाई हुई तो मैं मर जाऊँगा
तुम से उठ कर के मैं किधर जाऊँगा
जाऊँगा इधर उधर पागल की तरह
याद करूँगा सारे लम्हें वो पल वो दिन
जो हम ने अकेले में साथ में बिताए हैं
क्या कैसे बयाँ करूँ कुछ समझ नहीं आता
तुझ से दूर जाने का ख़याल तक सहा नहीं जाता
मैं क्या बताऊँ तुम क्या हो मेरी
कब तक इन ख़्यालों में मरना होगा
कब होगा ऐसा जब हम दो ही होंगे
कब होगा ऐसा कि बस ज़िंदगी होगी
क्या होगा ऐसा कि हँसी-ख़ुशी होगी
ये क्या समाज है ये कैसा समाज है
जो किसी की ख़ुशी नहीं देख सकता
ऐसे समाज से हमें क्या चाहिए
और क्या दे भी सकता है ये कुछ हमें
मुझे तेरे इलावा कुछ नहीं चाहिए
तू बस मेरी हो जान, ये यक़ीं चाहिए
मैं तेरे बिना जैसे तबाह हो जाऊँगा
पागलों की तरह राह की धूल खाऊँगा
क्या करूँगा कुछ ख़बर नहीं होगी मुझे
पीड़ा के इलावा कुछ असर नहीं होगी मुझे
तेरी शादी या'नी मौत होगी मेरी
जिस पर तेरे अपने शान से नाचेंगे
मिठाई बाँटी जाएँगी मौज उड़ाएँ जाएँगे
सब लोग शान से जश्न मनाएँगे
और मेरे अपने मुझे बचाएँगे
मैं तो तबाह सा हो जाऊँगा
मैं तो तबाह सा हो जाऊँगा
मैं तो तबाह सा हो जाऊँगा
बिन तेरे राह की धूल खाऊँगा

— Deep kamal panecha

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