नींद से क्यूँ मिरी दुश्मनी हो गई
ऐसी कैसी मुझे दिल-लगी हो गई
इस तरह ख़ुद को उस
में मिला बैठा मैं
पूरी दुनिया ही ये अजनबी हो गई
सारी दुनिया से किस तर्ज़ पर मैं लड़ूँ
उस के ही साथ में जब कमी हो गई
है मिरी नींदों का बस उसी से वुजूद
उस के बिन ये भी नाराज़ सी हो गई
मैं ने आँखें डुबों दी गले माँ से लग
माँ की आँखों में भी फिर नमी हो गई
मैं ने तो गुफ़्तगू उस से यूँ ही की थी
जाने कब वो मिरी ज़िन्दगी हो गई
उस के आगे मैं सर भी झुका लेता हूँ
रब की मानों यहीं बंदगी हो गई
हाँ लिया देख सब कुछ दुबारा मैं ने
उस की सब ग़ज़लों में हाज़िरी हो गई
इतना कस के लगा उस के सीने से मैं
उस की, अंदर मिरे ख़ुशबू सी हो गई















