कोई न जाने ध्यान उस का बज़्म में किस ओर है
कोशिश मगर मेरी तरफ़ करने की तो पुर-ज़ोर है
कहना है उस का आपसे मुझ को कोई मतलब नहीं
तो फिर नज़र मेरी तरफ़ करने की ये क्या डोर है
ये दौलतें ओ शोहरतें ईमान सकती है डुला
लेकिन उसी का जो ज़मीर-ओ-ज़ेहन से कमज़ोर है
दिल को जमाने से तिजोरी में छुपा के था रखा
फिर भी चुरा के ले गया वो कितना आला चोर है
वो दूर रहता मुझ से हर दम पास रहने के लिए
वो पास रहता है कि ज्यूँ सागर का दूजा छोर है
इक का गला पकड़ा था मैं ने महज़ तेरे ज़िक्र पे
अब कहते हैं सब उस का आशिक़ पूरा आदमख़ोर है
हम गैर हैं कहते फ़िरो तुम चाहें पूरी दुनिया में
पर दुनिया का ये शोर है तू "दीप" की गणगौर है
कितनी दफ़ा तुझ को बताऊँ, ख़ुद समझ जा यार अब
तू जैसे मैं ख़ुद और तू ही काळजे री कोर है















