ऐ ख़ुदा तू एक बार रोने का हुनर दे दे

ये अज़ाब और सह सकूँ मैं वो जिगर दे दे

ये कलेजा हैं मिरा कोई खिलौना तो नहीं
तू ज़रा सा तो इसे सुकून का असर दे दे

दर्द ग़म अज़ाब रंज दुख सभी मुझे दिए
इन सभी से अब नजात पाने की नज़र दे दे

मैं ही क्यूँ हमेशा हर दफ़ा वफ़ा ही करता हूँ
थोड़ी तो मुझे भी बे-वफ़ाई की कसर दे दे

और "दीप" कितना हारें कितना और दुख सहे
अब तू इस को महज़ ज़िन्दगी ही मुख़्तसर दे दे

आँखें नम जिगर में आग दिल में चैन ही नहीं
फ़िक्र है कि और तू कहीं न ये सफ़र दे दे

— Deep kamal panecha

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