"तबाह"

कुछ ख़ामी तो मुझ में है ही ऐसे तो कोई तन्हा नहीं करता
ज़ख़्म अता नहीं करता ख़ुदस जुदा नहीं करता
मैं ने तो अब तक किसी को सताया नहीं किसी को रुलाया नहीं
फिर क्यूँ कोई मुझ से वफ़ा नहीं करता
दाग़ ही दाग़ हैं मेरे जिस्म पर चाक गिरेबाँ का मैं
बस इसी लिए कोई मुझ से गिला नहीं करता

हसीं ख़्वाब सी गुज़ारनी चाहिए ज़िन्दगी दोज़ख़ सी गुज़ार रहा हूँ
मेरी इबारत के हर हर्फ़ को सीने पर लहू से उतार रहा हूँ
गुज़ार रहा हूँ बुराई में तन्हाई में रुसवाई में परछाई में
आख़िरश यही लिखा है क्या मेरी ज़िंदगी की रौशनाई में

ख़्वाब हक़ीक़त नहीं पर मैं समझता हूँ
तेरे बिना ही सही ज़िंदा तो रहता हूँ
रहता हूँ ख़ामोश कोई आरज़ू कोई जुस्तजू नहीं करता
तेरे साए के सिवा अब मैं किसी से गुफ़्तगू नहीं करता

कब तक ख़्वाब की आरज़ू पर ज़िन्दगी चलेगी
कब तक साए से गुफ़्तगू रहेगी
ये बहुत लम्बा वक़्त हो चुका है
अब जान-ए-जाँ तेरे लौट आने का वक़्त हो चुका है
कुछ तो मेरा ख़याल कर या मुझ से कोई सवाल कर
बस इतना कमाल कर आ गले लगा और तबाह कर

— Deep kamal panecha

More by Deep kamal panecha

Other nazm from the same pen

See all from Deep kamal panecha →

Hasrat Shayari

Shers of hasrat.

All Hasrat Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling