इकरार

तन्हाई में हम ने दिन गुज़ारे हैं
अब हम आपसे पूछते हैं क्या आप हमारे हैं
हम तो हुकुम यहाँ मौजूद भी नहीं
फिर आपने किस के लिए बाल सँवारे हैं
गुज़ारे हैं जैसे हम ने ये सुब्ह-ओ-शाम
क्या कभी आपने भी गुज़ारे हैं
चाँद तारे सितारे शब ठण्डी हवा और तिरा शाइ'र
मुझे तड़पाने रुलाने घुटाने आते सारे हैं
पल पल मिल कर पल पल खोने वाले
ग़ैर की बाहों में हसीं रात बन के सोने वाले
रुलाने वाले तेरे अज़ाब हैं
और फ़क़त तेरा मेरे सामने ही हिज़ाब हैं
कुछ तो भरम रख सुक़ून-ए-मुहब्बत का
या थोड़ा करम रख सुक़ून-ए-मुहब्बत का
दिल को चैन नहीं आराम नहीं
मुहब्बत का ये तो काम नहीं
जिस दर्ज़ा मैं हुआ हूँ बर्बाद
उस दर्ज़ा तो कोई बर्बाद नहीं
मैं मुसलसल इल्तज़ा करता रहा
मेरे इज़हार-ए-यार को तरसता रहा
इज़हार आया ना मगर वो पराया ना
मैं अपनी अना पे पैहम चोट कर रहा हूँ
पर नहीं "दीप" अब ख़ुदाया ना
ये जो भी सानेहा हुआ मेरा साथ मुश्किल
आप चारों ने ही किया हैं मुझे काइल
तू, तेरी बातें, तेरा शाइ'र, मेरा दिल
अब ख़याल हैं मेरा, शायद तू नहीं मेरे काबिल
अब ख़ुदा तेरा सहारा हैं, मुझे वो शख़्स दे
या इन चारों की ग़लती से मुझे बख्श दे
तुम से दूर रह कर, मैं ने इतना लिखा हैं
तो सोच एक दफ़ा
तेरे पास हुआ तो क्या क्या कर दूँगा आग लगा दूँगा
तेरे इज़हार के बा'द तो सनम मैं दुनिया भुला दूँगा

— Deep kamal panecha

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Zulf Shayari

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