मुझे पहले पहल इस इश्क़ का डर है नहीं बिल्कुल
मुझे पहला निवाला माँ हमेशा चख के देती थी
नया इक मोड़ देखो आ गया मेरी कहानी में
दिवाना रोज़ मिल कर भी नहीं मिलता दिवानी में
भुला सकती नहीं अब तो मुझे तुम जान कर जाना
ये अपनी जान दी तुझ को मुहब्बत की निशानी में
नहीं होगी जुदा सच्ची मुहब्बत से मुहब्बत अब
मरेगा अब नहीं किरदार भी मेरी कहानी में
उसी के देखने से बस दिया रौशन हुआ होगा
उसी ने देखना छू कर लगा दी आग पानी में
हिस्से में इश्क़ मेरे क़ब्ज़े में इश्क़ है अब
हर चीज़ भाव में बस सस्ते में इश्क़ है अब
कॉपी किताब क्या है कहते हैं आज बच्चे
मैंने कहा है इन के बस्ते में इश्क़ है अब
हाँ मिरी पहली नज़र उन से मिली थी जनवरी में
इश्क़ का इज़हार करना है मुझे इस फ़रवरी में
हाँ इश्क़ का इज़हार करना है अभी
तू बिन मुहब्बत के जिया भी है कभी
ये दिल किसी के भी नही बस में मगर
सच इक यही इस दिल के बस में है सभी
मुहब्बत से तिरी ये ज़िन्दगी मेरी सँवर जाती
तिरे इक साथ से बस ज़िन्दगी मेरी गुज़र जाती
मिरा जो हाल है,होता,सभी का ही मुहब्बत में
वही हर-सू नज़र आती जिधर भी ये नज़र जाती
सुना है जागने पर ही तिरे होता सवेरा है
सुना है बंद कर ले आँख तो ये शब ठहर जाती
भूली-बिसरी ही सही पर इक कहानी याद है
आदमी है वो उसे अपनी जवानी याद है
भूल जाती है यहाँ लड़की दिवाने को मगर
हम दिवानों को वही पहली दिवानी याद है
अब हमारा हो मुकम्मल राब्ता जाने कहाँ
कौन भूलेगा लबों पर दी निशानी याद है