अभी दस्तक जो दिल पे दे रहा है
    समझ लो जान मेरी ले रहा है

    किसी से पूछ लेना ही सही है
    मेरे बिन रात वो कैसे रहा है
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    Shubhangi Bharti
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    जिसे समझा था नाकारा नहीं था
    वो लड़का यार आवारा नहीं था

    किसी हासिल नज़र की कहकशाँ में
    कहीं भी एक वो तारा नहीं था

    मुहब्बत में भले वो मर चुका है
    मगर हालात का मारा नहीं था

    सभी को चाहने वाला अकेला
    किसी दिल में वो बेचारा नहीं था

    किसी से हार बैठा है अभी वो
    ख़ुदा से जो कभी हारा नहीं था

    सड़क सूनी पड़ी है भीड़ में भी
    समंदर पी गया खारा नहीं था
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    Shubhangi Bharti
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    मैं उजालों का नहीं रातों का क़ायल हूँ सनम
    आप भी इक चाँद हैं ये जानकर अच्छा लगा
    Shubhangi Bharti
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    भूल बैठा चाँद को पर कुछ सितारे याद हैं
    याद वैसे कुछ नहीं पर दोस्त सारे याद हैं
    Shubhangi Bharti
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    मेरे दिल में आज भी बस वो पुराने दोस्त हैं
    हाँ वही जिनसे मिलोगे तो लगेगा मैं ही हूँ
    Shubhangi Bharti
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    पीठ में ख़ंजर सुना है मारते हैं दोस्त भी
    यार फिर तो दोस्त को भी आज़माना चाहिए
    Shubhangi Bharti
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    कह उसे ये तू लिहाज़ा ख़त जलाए आज ही
    मौत के दिन ही बदन को भी जलाना चाहिए
    Shubhangi Bharti
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    सूख के काँटा हुआ है दिल किसी की चाह में
    दिल कि पहले जो गुलाबों की तरह रखता था मैं
    Shubhangi Bharti
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    मानता हूँ मैं कि ये इज़हार उसका था नहीं
    पर नहीं कहना कि मैं हक़दार उसका था नहीं

    इक सदी का साथ तो था उसके मेरे दरमियाँ
    फिर उसे ये क्यूँ लगा मैं प्यार उसका था नहीं

    तोड़ने को ये खिलौना ही मिला था क्या उसे
    क्यूँ किया उसने ये दिल व्यापार उसका था नहीं

    मैं भला कैसे समझ पाता किसी की चाल को
    यार आँखों में कभी इन्कार उसका था नहीं

    सौ दिलासों का मैं आख़िर क्या करूँगा ये कहो
    जानता हूंँ मैं अभी मैं प्यार उसका था नहीं

    भारती ये ज़िंदगी हर दिन नई होगी यहाँ
    जो नहीं है पास तू हक़दार उसका था नहीं
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    Shubhangi Bharti
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    आपकी बातों को बेशक मानकर अच्छा लगा
    दोस्त प्रेमी बन सकेंगे जानकर अच्छा लगा

    सालों से उस बंद कमरे की घुटन में क़ैद था
    ख़ुद को तेरे ग़म से यूँ अनजान कर अच्छा लगा

    एक ही तस्वीर को घंटों निहारा करता हूँ
    आईने में ख़ुद को भी पहचानकर अच्छा लगा

    लग गई ये उम्र सारी एक ही के प्यार में
    प्यार में वो एक ज़िद भी ठानकर अच्छा लगा

    कब से ही इस दिल में मेरे जिस घड़ी का ख़ौफ़ था
    दो ही पल का उसको अब मेहमान कर अच्छा लगा

    'भारती' वो शख़्स जो घर कर गया था मन में यूॅं
    एक जो वो था ख़ुदा इंसान कर अच्छा लगा
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    Shubhangi Bharti
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