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फिर शुरू तर्क-ए-त'अल्लुक़ की कहानी मत करो
बात ये है बात अब कुछ भी पुरानी मत करो
बात ये है बात अब कुछ भी पुरानी मत करो
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ये मुहब्बत दाख़िले के वक़्त आसाँ लगती है
पर मुहब्बत में शुरू फिर इम्तिहाँ हो जाते हैं
पर मुहब्बत में शुरू फिर इम्तिहाँ हो जाते हैं
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इस तरह शा'इरी का असर हो गया
खुशनुमा ज़िंदगी का सफ़र हो गया
खुशनुमा ज़िंदगी का सफ़र हो गया
मिल गई चाँद की रौशनी जब उसे
इक नया पौधा पूरा शजर हो गया
यार संगीत इतना सरल भी नहीं
तान इक सीखते रात भर हो गया
बा'द सर्दी यहाँ फिर ज़ियादा लगी
मेरा कंबल इधर से उधर हो गया
चाय मीठी बनी और अच्छी बनी
देखते सीखते ये हुनर हो गया
मैं उसे फिर कभी चूम लूँगा कहीं
पास वो पहले जैसे अगर हो गया
दिल नहीं लग रहा है किसी से 'शुभम'
कैसा था कैसा तेरा जिगर हो गया
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हमारी ग़ज़ल बहर में है
हवा की चली लहर में है
हवा की चली लहर में है
किसी ने हमें ये ख़बर दी
यहीं वो इसी शहर में है
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आप को देख कर राबता हो गया
और ये दिल कहीं लापता हो गया
और ये दिल कहीं लापता हो गया
बात हम कर रहे चांदनी रात में
आ
समाँ को सभी का पता हो गया
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