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Krishnakant Kabk
SHER
न रूई हो तो अपने अश्कों से बाती बनाएँगे
बुझा दीया हमारा तो हवा से लड़ भी जाएँगे
Krishnakant Kabk
10
SHER
तुम्हारे साथ मुझ को चाय पीना है मगर
ये भी है शर्त कप सिर्फ़ एक होना चाहिए
Krishnakant Kabk
9
SHER
मैं कहूँ भी तो कैसे कहूँ अब ग़ज़ल
शे'र भी मेरे तन्हा हैं मेरी तरह
Krishnakant Kabk
8
SHER
ज़रा सा हाथ लगने से हो जाते ज़ख़्म सारे ठीक
तेरे हाथों में जादू है तू चारासाज़ थोड़ी है
Krishnakant Kabk
7
SHER
मोहब्बत से मोहब्बत मिल गई जैसे
कि सहरा में कली इक खिल गई जैसे
Krishnakant Kabk
6
SHER
वो रस्मन पूछ लेती है कि मिलना या नहीं मिलना
फिर इस के बा'द तो मिलना किसे अच्छा नहीं लगता
Krishnakant Kabk
5
SHER
बुलाया शाम को लेकिन वहाँ मैं सुब्ह जा बैठा
सुना था देर से आना उसे अच्छा नहीं लगता
Krishnakant Kabk
4
SHER
मोहब्बत कर मोहब्बत कर यही बस कह रहा है दिल
सुन अपने दिल की तू ये ग़ैर की आवाज़ थोड़ी है
Krishnakant Kabk
3
SHER
हर गीत में हर बार गाऊँगा तुझे
अपनी ग़ज़ल में गुनगुनाऊँगा तुझे
Krishnakant Kabk
2
GHAZAL
मोहब्बत से मोहब्बत मिल गई जैसे
कि सहरा में कली इक खिल गई जैसे
Krishnakant Kabk
1
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