यूँंँ हक़ जताते मैं ग़ज़ल हूँ वो तख़ल्लुस है कोई
बहरों में करते क़ैद मिसरे रब्त में होते नहीं
बहरों में करते क़ैद मिसरे रब्त में होते नहीं
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चेहरे पे नूर आए जब हो ख़याल उस का
बिन बात मुस्कुराना ये भी कमाल उस का
बिन बात मुस्कुराना ये भी कमाल उस का
होने लगे हया से रुख़सार लाल मेरे
चुपके से कौन मलता रंग-ए-गुलाल उस का
बस सोच के उसे फिर ख़ुद में सिमटती हूँ मैं
बाँधा नहीं मुझे पर कैसा ये जाल उस का
दिल ढूँढ़ता है हरदम मिलने के सौ बहाने
कोई मुझे बताए क्या अर्ज़-ए-हाल उस का
लब भी न थे हिलाए बोली न कुछ ज़बाँ भी
नज़रों से गुफ़्तगू का ऐसा जमाल उस का
कहते हैं मर्ज़-ए-उल्फ़त है ला'इलाज लेकिन
हर लम्स में अजब सा था इंदिमाल उस का
बन बे'नवा 'प्रिया' ने माँगा ख़ुदा से उस को
मंज़ूर दिल को कब है रंज-ओ-मलाल उस का
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सच को सच कह कहानी न कहना
आग को फिर यूँ पानी न कहना
आग को फिर यूँ पानी न कहना
दान कर ख़ुद बखानी करे जो
ऐसे इंसाँ को दानी न कहना
बिन तुम्हारे मैं बे-रंग मौसम
अब फ़िज़ा को सुहानी न कहना
ज़िन्दा हूँ ज़ीस्त के क़र्ज़ ख़ातिर
है हसीं ज़िन्दगानी न कहना
अब तलक दर्द सीने में काबिज़
ज़ख़्म अपनों के फ़ानी न कहना
कुछ सवालों पे रख ली है चुप्पी
बस मेरी ना'तवानी न कहना
दिल की फ़ितरत रही काँच सी तुम
इश्क़ की मेहरबानी न कहना
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तोड़ देते सब से हम भी राब्ता
दिल कहे अपनों को यूँ खोते नहीं
याद कर उन को बिताया पूरा दिन
स्याह रातों को भी अब सोते नहीं
दे रहे पुरज़ोर सब को मशवरे
क्यूँ वही उन को कभी ढोते नहीं
कह दिया है सच को सच हम ने सदा
कोई पिंजरे में पले तोते नहीं
हम भला ग़म की नुमाइश क्यूँ करें
बोझ ग़म के ग़ैर तो ढोते नहीं
हो गई दिल की ज़मीं बंजर 'प्रिया'
तुख़्म-ए-उल्फ़त बारहा बोते नहीं
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इक टूटे हुए दिल की मरम्मत नहीं होती
फिर चाह के भी पहले सी उल्फ़त नहीं होती
Read Fullफिर चाह के भी पहले सी उल्फ़त नहीं होती
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करता था वो हरदम मुझ से इश्क़ का दावा
और रहा मुझ को उस के हर दावे से इश्क़
और रहा मुझ को उस के हर दावे से इश्क़
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अब पाक यहाँ कोई किरदार नहीं होता
दिखता है भले लेकिन वो प्यार नहीं होता
दिखता है भले लेकिन वो प्यार नहीं होता
कब इश्क़ के दीवाने नुक़सान नफ़ा देखे
जो सोच के हो जाए वो प्यार नहीं होता
झुक जाती अना थोड़ी फिर टूट नहीं सकते
नाता कोई भी इतना लाचार नहीं होता
मसरूफ़ हुआ हर दिन अब चैन सुकूँ चाहत
इतवार भी पहले सा इतवार नहीं होता
आते हैं वो अक्सर छत पे चाँद की ख़्वाहिश में
यूँ जागना अपना भी बेकार नहीं होता
पत्थर है ख़ुदा कहते मुझ से ये जहाँ वाले
जब उस के करम से घर गुलज़ार नहीं होता
हो जानना मुझ को तो दिल पे मेरे दो दस्तक
हर बार मेरा चेहरा अख़बार नहीं होता
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ज़िन्दगी खेल है तो प्यादा मैं
ख़र्च कर उम्र अब हूँ आधा मैं
ख़र्च कर उम्र अब हूँ आधा मैं
कोशिशें थीं नज़र से गिर जाऊँ
झुक न पाया था वो इरादा मैं
यूँ तो अंदाज़-ए-ज़ीस्त था दिलकश
गुड़ से मीठा मगर ज़ियादा मैं
मिल्कियत दिल की जेब से ख़ाली
हर नज़र में नवाब-ज़ादा मैं
बस शजर सी रही मेरी फ़ितरत
आख़िरश काम का बुरादा मैं
रखते किरदार अब सभी दोहरे
रूह तक पाक वो लबादा मैं
तुम कभी मुझ को आज़मा लेना
जो न टूटे 'प्रिया' वो वा'दा मैं
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