मैं बताऊँ क्या कि कितनी गहरी हैं आँखें तुम्हारी
हू-ब-हू लगती समुंदर जैसी हैं आँखें तुम्हारी
हू-ब-हू लगती समुंदर जैसी हैं आँखें तुम्हारी
ये गुलाबी होंठ बिखरी ज़ुल्फ़ ये रुख़सार पे तिल
और फिर हाए क़यामत ढाती हैं आँखें तुम्हारी
कोई मुझ जैसा हो या फिर शाह या कोई क़लंदर
सब को दीवाना बना कर रखती हैं आँखें तुम्हारी
यार आख़िर तुम को चेहरा ढकने से है फाएदा क्या
क़त्ल लोगों को किया तो करती हैं आँखें तुम्हारी
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जो लिखा दीवारों पे था नाम तेरा मिट रहा है
तू भी या'नी मेरे दिल से रफ़्ता-रफ़्ता मिट रहा है
तू भी या'नी मेरे दिल से रफ़्ता-रफ़्ता मिट रहा है
रेत पे लिक्खा हुआ वो नाम मिट जाता है जैसे
वैसे ही तो मेरे दिल से तेरा चेहरा मिट रहा है
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ख़ुदा जाने वो अब किधर जा रहे थे
वो महफ़िल से उठ के मगर जा रहे थे
वो महफ़िल से उठ के मगर जा रहे थे
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मुझे जिस से मुहब्बत है मुहब्बत है
करें क्या जिस को नफ़रत है मुहब्बत है
करें क्या जिस को नफ़रत है मुहब्बत है
उसे किस की ज़रूरत है बताऊँ मैं
उसे जिस की ज़रूरत है मुहब्बत है
ख़ुदा तुझ से शिक़ायत क्यूँ करूँ मैं अब
अगर मुझ पे ही ग़ुर्बत है मुहब्बत है
जहाँ ख़तरा है जाने से वाँ जाने की
मुझी को तो नसीहत है मुहब्बत है
मुहब्बत करने की गर उस सितमगर से
किसी में दोस्त हिम्मत है मुहब्बत है
कोई दिक्कत नहीं है मुझ को उस से दोस्त
अगर वो बे-मुरव्वत है मुहब्बत है
तू चल अब मौत आके बोली मुझ से कल
ग़मों से या'नी रुख़्सत है मुहब्बत है
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जहाँ चाहो ख़ुशी से तुम चले जाना मगर सुन लो
हमारे बीच जो कुछ है हुआ तुम को मिटाना है
किया था एक वा'दा जो अगर कुछ याद हो तुम को
खिंचाए साथ जो तस्वीर उन को फिर जलाना है
अभी तो जा रही हो तुम मगर इक रोज़ यूँ होगा
तुम्हें फिर देखना मेरी कहानी गुनगुनाना है
सितमगर, बेरहम, ज़ालिम, न जाने और क्या हो तुम
तुम्हीं में आदतें हैं ये कि ऐसा ही घराना है
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हो सके तो बातें कर लिया कीजे हम से
मौत का है मौसम चल रहा जान-ए-जानाँ
मौत का है मौसम चल रहा जान-ए-जानाँ
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