Priya omar

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@kavyapriyaomar

Priya omar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Priya omar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

यूँंँ हक़ जताते मैं ग़ज़ल हूँ वो तख़ल्लुस है कोई बहरों में करते क़ैद मिसरे रब्त में होते नहीं — Priya omar
रूदाद-ए-मुहब्बत गर जो लफ़्ज़ बयाँ कर दें अहसास तुम्हें हो क्यूँँ मैं दफ़्न रिसालों में — Priya omar
कितना आसाँ है यूँँ लब पर हँसी सजा लेना सोचना तुम्हें फिर हौले से मुस्कुरा देना — Priya omar
मैं ठहरना चाहती हूँ कोह के मानिंद, पर शम्स बन के रोज़ ही घर से निकलना है मुझे — Priya omar
अधूरे ज़ीस्त के मिसरे ग़ज़ल कोई अधूरी सी क़वाफ़ी से बदलते तुम मेरी फ़ितरत रदीफ़ों सी — Priya omar
लौट कर आती मुझ तक मेरी ही सदा भीड़ में इस क़दर तन्हा है मेरा दिल — Priya omar
करता था वो हरदम मुझ सेे इश्क़ का दावा और रहा मुझ को उस के हर दावे से इश्क़ — Priya omar
ग़म छुपाने के सौ थे तरीके मगर मैं ने चेहरा रखा मुस्कुराया हुआ — Priya omar
रोज़ ही कवाफ़ी से लड़ती हैं मेरी ग़ज़लें दूर से तमाशा ये अब रदीफ़ें देखेंगी — Priya omar
ज़ियादा है नमक अश्कों में मेरे ज़मीं ये दिल की बंजर हो रही है — Priya omar

Ghazal

लब पर हँसी है ख़्वाब सर-ए-दार इन दिनों कहते हैं लोग हम को अदाकार इन दिनों जीने न दे सुकूँ से न ही मरने दे हमें साथी ग़म-ए-हयात के अफ़्कार इन दिनों झूठी अना की क़ैद में उलझे हैं इस क़दर ख़ुद के वुजूद से हुए दो चार इन दिनों शोहरत के नाम पर हया को ताक पर रखें नौ-नस्लें चुन रहीं नए किरदार इन दिनों बचपन में हम सुकूँ की गुज़रगाह से चले चाहत रिफ़ाह फ़र्ज़ में मिस्मार इन दिनों गुम-सुम सी ज़ीस्त है किसी दस्तक की मुंतज़िर जैसे बदन को नफ़्स की दरकार इन दिनों कैसे तलाशे रंग-ए-वफ़ा उन में हम 'प्रिया' आते नज़र वो इश्क़ रियाकार इन दिनों — Priya omar
ग़म-ए-ज़िन्दगी के हसीं जब सितम देखते हैं कभी मुश्किलें तो कभी ख़ुद का दम देखते हैं रह-ए-हक़ पे बेख़ौफ़ चलते रहे हम हमेशा कहाँ हौसले झूठी राहों के ख़म देखते हैं मुहब्बत में कैसा अजब हाल होने लगा है नज़ारा कोई हो मगर तुम को हम देखते हैं चलाते हैं अक्सर उसी पर सभी ज़ोर अपना ये जब नर्म दिल का कोई मोहतरम देखते हैं लबों की हँसी से बहलते सभी हैं मगर कब हमारी उदासी ख़मोशी अलम देखते हैं फ़लक छूने की चाहतों में ये देखा है अक्सर ज़मीं की तरफ़ फिर ये सब लोग कम देखते हैं सियासत मुहब्बत इबादत लिखे बेवफ़ाई 'प्रिया' हर्फ़ तेरे मता-ए-क़लम देखते हैं — Priya omar
कहीं पर है ज़मीं सूखी कहीं बादल बरसता है कोई इक बूँद को तरसे कहीं दरिया भरा सा है चमन में हैं शजर ऐसे समर पत्ते हसीं गुलपोश मगर ता'उम्र होता कब परिंदों का बसेरा है सफ़र तन्हा न है मंज़िल मुसलसल चलते जाना तू जहाँ में हर किसी ने ख़ुद तलाशा अपना रस्ता है रहेगा कब तलक यूँँ मुंतज़िर आज़ादी के प्यारे थे जिन के हौसले ज़्यादा उन्होंने तख़्त पलटा है जवानी छोड़ जाएगी नफ़स भी बे-वफ़ा होगी ढले जब उम्र तो फिर हर कोई बच के निकलता है मिली नाकामियों से जाना रिश्तों की हक़ीक़त को कि हर चेहरे के पीछे भी छिपा इक और चेहरा है किसी मतलब की ख़ातिर ही अदब से मिल रहा है तू वगरना तेरा लहजा कब हुआ शीरे से मीठा है लिखा जब हाल-ए-दिल अपना 'प्रिया' को ये समझ आया जो उतरा काग़ज़ों पर वो लहू का मेरे क़तरा है — Priya omar
उठा कर ज़िन्दगी की तुम सभी रंगीनियाँ रख दो निकालो कोह से दरिया जहाँ भी बिजलियाँ रख दो मेरे पत्थर बदन पर आ के कुछ सरगर्मियाँ रख दो गुज़ारिश है लबों की आज तुम मदहोशियाँ रख दो हज़ारों रंज शामिल हैं हमारे दरमियाँ माना उठो काटो अलग कर के अना की बेड़ियाँ रख दो इमारत ही इमारत के घने जंगल बसाए हैं कि कह दो शम्स से जा कर तपिश में नर्मियाँ रख दो बहुत से दिन गुज़ारे हैं ख़मोशी के लिबासों में तुम्हीं आ कर हवाओं आज कुछ सरगोशियाँ रख दो भला ये भी कहाँ मुमकिन कि मेरे दर्द को नापो चलो हिस्से में मेरे और थोड़ी सिसकियाँ रख दो सियासत कर रही खिलवाड़ जनता की उमीदों से जलाकर मिन्नतों की अब 'प्रिया' सब अर्ज़ियाँ रख दो — Priya omar
ज़बाँ से लफ़्ज़ आँखों से न अब आँसू निकलते हैं न पलकों पे मेरी कोई नए से ख़्वाब पलते हैं हुई नफ़रत उगे अहसास के सारे दरख़्तों से कि संग-ए-दिल पे हूँ हैराँ मेरे क्यूँ तुख़्म फलते हैं किसी के हाथ में कुछ भी नहीं समझो मेरे यारो कहाँ आड़ी लकीरों से नसीबा खेल चलते हैं अजब फ़ितरत है लोगों की न ख़ुद का अक्स पहचानें कभी चेहरे बदलते हैं कभी रंगत बदलते हैं हुजूम-ए-ग़म में उलझी तो सुख़न से दोस्ती कर ली समुंदर बेकली के फिर ग़ज़ल बन के उछलते हैं भरोसा टूट जाए तो तलाफ़ी हो नहीं सकती 'प्रिया' गिर्दाब में कब तक फँसे रिश्ते सँभलते हैं — Priya omar
कभी ग़ज़लें कभी क़िस्से कभी कविता मैं लिखती हूँ तसव्वुर में तुझे मिलने का हर ज़रिया मैं लिखती हूँ नहीं है कम वो जो इक शख़्स घर में सख़्त सा रहता पिता को इस लिए सब सेे घना साया मैं लिखती हूँ तुझे माना सदा कृष्णा तुझी से प्रीत बाँधी है रहूँ जो साथ तेरे ख़ुद को फिर राधा मैं लिखती हूँ कफ़स में जिस्म की बस नफ़्स हरदम छटपटाती है लगूँगी मैं तुझे ज़िंदा मगर मुर्दा मैं लिखती हूँ मिले कोई जो जिस्मानी मुहब्बत में नहीं उलझे भला मुमकिन कहाँ ये पल न जाने क्या मैं लिखती हूँ न जाने कैसी फ़ितरत से 'प्रिया' रब ने नवाज़ा है कि हर ठोकर से जो पहला सबक़ मिलता मैं लिखती हूँ — Priya omar
बिन तुम्हारे ज़िन्दगी मेरी सिफ़र हो जाएगी रहगुज़र सपनों की अब तो दर-ब-दर हो जाएगी शम्अ' मैं ने ही जलाए थे शुआओं के लिए क्या पता था इन हवाओं को ख़बर हो जाएगी शहर में ये सोच कर मैं ने लगाए पौधे कुछ साथ गुल के, तितलियों की भी ठहर हो जाएगी दिल बिछाकर रख दिया है नाज़नीं की राह में देखना है कब तलक मुझ पे नज़र हो जाएगी हाल-ए-दिल मेरा न पूछो दोस्तों बन के तबीब हर दवा इस इश्क़ में अब बे-असर हो जाएगी आबले दिल पर पड़े, नासूर बन रिसने लगे दर्द से ये ज़िन्दगी अब मुख़्तसर हो जाएगी दो सदा मुझ को कभी तन्हाई की तारीकी में स्याह रातों में "प्रिया' उजली सहर हो जाएगी — Priya omar
ग़लतियों से सीखने का भी मज़ा कुछ और है पर जहाँ का आजकल तो क़ायदा कुछ और है कर रहे हैं हम तो रोज़ाना मुलाक़ातें मगर निस्बत-ए-उल्फ़त बिना ये सिलसिला कुछ और है बढ़ रहे हैं मेरे नक़्श-ए-पा तुम्हारी गलियों में राब्ता है या नया सा मश्ग़ला कुछ और है मरहला दर मरहला हम साथ चलते ही रहे जानता था दिल हमारा रास्ता कुछ और है अब चढ़ा ली हैं ज़बाँ पर तल्ख़ियाँ हम ने ऐ दिल शीरीं फ़ितरत से अलग ये तजरबा कुछ और है ज़िन्दगी उस मोड़ पर लाई कि कर लूँ ख़ुद-कुशी ज़िंदा रह के मरने का भी हौसला कुछ और है हिज्र, आँसू, बेवफ़ाई, दर्द-ओ-ग़म सब हैं 'प्रिया' इस अज़िय्यत में सुख़न का भी नशा कुछ और है — Priya omar

Nazm