पुरानी हो चुकी बेशक किताबें इश्क़ की मेरी
मगर यादों के पन्ने आज भी महफूज़ रक्खे हैं
मगर यादों के पन्ने आज भी महफूज़ रक्खे हैं
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नहीं जाना कभी उस घर जहाँ इज़्ज़त नहीं होती
बिना माँ-बाप के घर में कभी रहमत नहीं होती
बिना माँ-बाप के घर में कभी रहमत नहीं होती
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"माँ-बाप बिना"
वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा।
वो शक्स नहीं जो इन के सिवा, हर किसी को पसंद आ जाऊँगा।
मैं रिश्ते बनाने आया हूँ, कोई सौदा न कर के जाऊँगा।
माँ-बाप से बढ़कर रिश्ता न कोई ये तुम्हें बता कर जाऊँगा।
वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा।
माँ कोख में ले कर चलती है, पिता सोच में ले कर चलते है।
बच्चों को कोई तकलीफ़ न हो, फर्ज़ों का बोझ उठा कर चलते है।
अपनी क़लम से लिख इनका, गुणगान भी कर के जाऊँगा।
वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा।
माँ-बाप के लाड़ प्यार में, डाँट तो बेशक होती है।
बच्चे कितने भी हो लेकिन, उन्हे फ़िक्र सभी की होती है।
उन की इस शिक्षा से मैं, हर मैदान फतेह कर जाऊँगा।
वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा।
कैसे भूलूँ आधीरात में, माँ का गीले से सूखे पर सुलाना।
कैसे भूलूँ उस बाप को, अपना पेट काट मुझ को खिलाना।
मैं तुम दोनो के बलिदान का, कभी कर्ज चुका न पाऊँगा।
वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा।
उन बच्चों के भी क्या कहने, जो माँ-बाप से अलग हो जाते है।
उन से कोई तकलीफ़ न हो, वृद्ध आश्रम छोड़कर जाते है।
रब्ब बोले ऐसी औलाद को, कभी माफ़ न मैं कर पाऊँगा।
वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा।
वो शक्स नहीं जो इन के सिवा, हर किसी को पसंद आ जाऊँगा।
मैं रिश्ते बनाने आया हूँ, कोई सौदा न कर के जाऊँगा।
माँ-बाप से बढ़कर रिश्ता न कोई ये तुम्हें बता कर जाऊँगा।
Read Fullवो शक्स नहीं जो इन के सिवा, हर किसी को पसंद आ जाऊँगा।
मैं रिश्ते बनाने आया हूँ, कोई सौदा न कर के जाऊँगा।
माँ-बाप से बढ़कर रिश्ता न कोई ये तुम्हें बता कर जाऊँगा।
वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा।
माँ कोख में ले कर चलती है, पिता सोच में ले कर चलते है।
बच्चों को कोई तकलीफ़ न हो, फर्ज़ों का बोझ उठा कर चलते है।
अपनी क़लम से लिख इनका, गुणगान भी कर के जाऊँगा।
वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा।
माँ-बाप के लाड़ प्यार में, डाँट तो बेशक होती है।
बच्चे कितने भी हो लेकिन, उन्हे फ़िक्र सभी की होती है।
उन की इस शिक्षा से मैं, हर मैदान फतेह कर जाऊँगा।
वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा।
कैसे भूलूँ आधीरात में, माँ का गीले से सूखे पर सुलाना।
कैसे भूलूँ उस बाप को, अपना पेट काट मुझ को खिलाना।
मैं तुम दोनो के बलिदान का, कभी कर्ज चुका न पाऊँगा।
वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा।
उन बच्चों के भी क्या कहने, जो माँ-बाप से अलग हो जाते है।
उन से कोई तकलीफ़ न हो, वृद्ध आश्रम छोड़कर जाते है।
रब्ब बोले ऐसी औलाद को, कभी माफ़ न मैं कर पाऊँगा।
वो गहना नहीं जो माँ-बाप बिना, हर किसी को मैं भा जाऊँगा।
वो शक्स नहीं जो इन के सिवा, हर किसी को पसंद आ जाऊँगा।
मैं रिश्ते बनाने आया हूँ, कोई सौदा न कर के जाऊँगा।
माँ-बाप से बढ़कर रिश्ता न कोई ये तुम्हें बता कर जाऊँगा।
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इसी उम्मीद से मैं देखता हूँ रास्ता उस का
वो आएगा ज़मी बंजर में इक दिन घर उगाने को
वो आएगा ज़मी बंजर में इक दिन घर उगाने को
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परेशानी तो है उस को कि मैं अब लौट आया हूँ
हूँ ज़िन्दा मैं उसे इस बात ने आफ़त में डाला है
हूँ ज़िन्दा मैं उसे इस बात ने आफ़त में डाला है
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