मानता हूँ मैं कि ये इज़हार उस का था नहीं
पर नहीं कहना कि मैं हक़दार उस का था नहीं
इक सदी का साथ तो था उस के मेरे दरमियाँ
फिर उसे ये क्यूँ लगा मैं प्यार उस का था नहीं
तोड़ने को ये खिलौना ही मिला था क्या उसे
क्यूँ किया उस ने ये दिल व्यापार उस का था नहीं
मैं भला कैसे समझ पाता किसी की चाल को
यार आँखों में कभी इनकार उस का था नहीं
सौ दिलासों का मैं आख़िर क्या करूँगा ये कहो
जानता हूँ मैं अभी मैं प्यार उस का था नहीं
भारती ये ज़िंदगी हर दिन नई होगी यहाँ
जो नहीं है पास तू हक़दार उस का था नहीं
— Shubhangi Bharti















