जिसे समझा था नाकारा नहीं था
वो लड़का यार आवारा नहीं था
किसी हासिल नज़र की कहकशाँ में
कहीं भी एक वो तारा नहीं था
मुहब्बत में भले वो मर चुका है
मगर हालात का मारा नहीं था
सभी को चाहने वाला अकेला
किसी दिल में वो बेचारा नहीं था
किसी से हार बैठा है अभी वो
ख़ुदा से जो कभी हारा नहीं था
सड़क सूनी पड़ी है भीड़ में भी
समुंदर पी गया खारा नहीं था
— Shubhangi Bharti















