ख़ुद को मर्यादा में ही रखना मुसलसल काम है
ज़िंदगी की धूप को सहना मुसलसल काम है
खींच लेने से दुपट्टा प्यार हो जाता है क्या
प्यार में तो आबरु ढंँकना मुसलसल काम है
रोज़ हर दहलीज़ पर जाना नहीं लगता सही
एक मंज़िल पे अडिग रहना मुसलसल काम है
झूठ की ता'रीफ़ से चेहरे बदलते हैं नहीं
जो सही लगता है वो कहना मुसलसल काम है
रात को भी चांँदनी से है ज़रा रंजिश अभी
फिर भी देखो साथ में रहना मुसलसल काम है
यूँंँ दरख़्तों को अभी काटो नहीं छोड़ो इसे
ज़िंदगी है एक दिन मरना मुसलसल काम है
— Shubhangi Bharti















