ख़ुश रहे मांँ-बाप जिस सेे वो ख़ज़ाना चाहिए
कब तलक बैठा रहूँगा अब कमाना चाहिए
कह उसे ये तू लिहाज़ा ख़त जलाए आज ही
मौत के दिन ही बदन को भी जलाना चाहिए
पीठ में ख़ंजर सुना है मारते हैं दोस्त भी
यार फिर तो दोस्त को भी आज़माना चाहिए
तुम जिसे आराम कहते हो वो बस तकलीफ़ है
आज भी मुझ को वो पहले का ज़माना चाहिए
बिन कहे तकलीफ़ तेरी जो समझ लेता है बस
फिर बिना पूछे भी उस को सब बताना चाहिए
भारती जो साथ तेरे है खड़ा मुश्किल में भी
उम्र भर बस साथ उस का ही निभाना चाहिए
— Shubhangi Bharti















