ख़ुदाया मुझे यूँ न हैरत से देखो
    यक़ीं तो करो बाख़ुदा बे-ख़ुदी है
    Shadab Shabbiri
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    थी किताबी किताब में गुज़री
    ज़िन्दगी सारी ख़्वाब में गुज़री

    उसके दरबार से रहा रिश्ता
    उम्र बस जी जनाब में गुज़री
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    Shadab Shabbiri
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    क़ाएम रहे उसूल पे दोनों अख़ीर तक
    मैं भी अना परस्त था ग़ैरत उसे भी थी
    Shadab Shabbiri
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    आ इधर बैठ गुफ़्तगू कर लें
    यार जो भी हो यार हैं हम लोग
    Shadab Shabbiri
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    ख़्वाब में रात रू-ब-रू था वो
    जैसा सोचा था हू-ब-हू था वो
    Shadab Shabbiri
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    इश्क़ को कार-ए-दिल्लगी समझा
    या ख़ुदा हम ये क्या समझ बैठे
    Shadab Shabbiri
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    चार सू ग़म की आग फैली थी
    मोम जैसा पिघल गया हूँ मैं
    Shadab Shabbiri
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    जुनून-ए-इश्क़ में ये बेख़ुदी का आलम है
    ख़ुद अपने शहर में अपना मकान भूल गए
    Shadab Shabbiri
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    आज फिर याद आ गई उनकी
    फिर हुईं आज तर-बतर आँखें
    Shadab Shabbiri
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    जी रहा हूँ मैं ऐसे आलम में
    आप होते तो मर गए होते
    Shadab Shabbiri
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