पाँच सालों की मोहब्बत को भुला देना है अब
कब तलक मैं हिज्र में ही शा'इरी करता फिरूँ
कब तलक मैं हिज्र में ही शा'इरी करता फिरूँ
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कब से शब-ए-उम्मीद हूँ दीदार की ख़ातिर तिरी
इक बार तो बंदे को हाल-ए-दिल सुनाने दो ज़रा
अब देखना है ये समुंदर किस तरफ़ ले जाता है
लहरों की बाहों में मिरी कश्ती को आने दो ज़रा
जो मुफ़्लिसी की आड़ में बचपन को भूले बैठे हैं
तालाब में फिरसे उन्हें गोते लगाने दो ज़रा
किस ने कहा फिरसे मोहब्बत की नहीं जा सकती है
ये ग़म-ज़दा लोगों को फिरसे दिल लगाने दो ज़रा
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ख़फ़ा होने पर तुम मना लेना मुझ को
अगर दिल करे आज़मा लेना मुझ को
अगर दिल करे आज़मा लेना मुझ को
उठा देना महफ़िल से जब दिल करे तू
मगर वक़्त पे फिर बुला लेना मुझ को
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हम गली से उस की कुछ आँसू बहा के निकले हैं
इश्क़ कितना है हमें सब सच बता के निकले हैं
इश्क़ कितना है हमें सब सच बता के निकले हैं
उस की मर्ज़ी है वो चाहे या न चाहे हम को पर
उस की ख़ातिर हम तो अपना सब लुटा के निकले हैं
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पास मेरे वो आ नहीं सकता
दूर उस से मैं जा नहीं सकता
दूर उस से मैं जा नहीं सकता
जब से मैं हारा हूँ मुहब्बत में
दिल कहीं भी लगा नहीं सकता
तेरे बिन मैं अधूरा सा लगता
हाथ तुझ से छुड़ा नहीं सकता
एक लड़की का हूँ मैं दीवाना
ख़ुद को पागल बता नहीं सकता
तेरी ख़ातिर मैं लाया हूँ कंगन
चाँद तारे मैं ला नहीं सकता
मैं ने रख दीं निकाल कर आँखें
अब वो मुझ को रुला नहीं सकता
शे'र लिखता हूँ ज़िंदगी पर मैं
बिन सुनाए मैं जा नहीं सकता
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क़त्ल होना भी ज़रूरी था हमारा
उन का कारोबार है चाकू छुरी का
उन का कारोबार है चाकू छुरी का
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