@mai_meri_kalam
Harsh Kumar Bhatnagar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Harsh Kumar Bhatnagar's shayari and don't forget to save your favorite ones.
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ये सिसकती हुईं आँखें ये खनकती पायल
दुख मनाएँ या ग़ज़ल लिखने का मौक़ा ढूँडें
राह तकते हुए आँखों का बुरा हाल हुआ
दिल लगाने के लिए अब कोई चर्ख़ा ढूँढें
एक दूजे के लिए अब कोई पागल नहीं है
अब मुनासिब है कोई अपने ही जैसा ढूँडे
ज़िंदगी जीने का हक़ हर किसी को है यहाँ पर
वक़्त-ए-आख़िर ही सही कोई जज़ीरा ढूँडे
तू अपने ख़त में ज़बाँ काट कर के रख देना
कि पढ़ते वक़्त उसे चीख भी सुनाई दे
न जाने क्यों बिछड़ते वक़्त रुसवाई ज़रूरी थी
हमारे वास्ते तो सिर्फ़ तन्हाई ज़रूरी थी
ये क्या हर रोज़ तू सपने दिखाता रहता है हम को
हमारी आँखों को तो सिर्फ़ बीनाई ज़रूरी थी
कभी आसान करती है कभी मुश्किल बढ़ाती है
ये दुनिया मार के ठोकर हमें चलना सिखाती है
चराग़-ए-लौ को इस बाद-ए-सबा ने मार डाला
परिंदे को शिकारी की वफ़ा ने मार डाला
कोई तो चार-दीवारी में घुट कर ख़ुश रहा है
किसी को तो ज़रा सी बस हवा ने मार डाला
तिरी कमसिन सी आँखें और ज़ुल्फ़ों से मोहब्बत है
जहाँ हैं नक़्श-ए-पा तेरे वो रस्तों से मोहब्बत है
तिरी तारीफ़ में जब से ग़ज़ल लिक्खी है शाइर ने
तभी से हम को काग़ज़ और हर्फ़ों से मोहब्बत है
मैं अपने आप को कब तक ये समझाता फिरूँ
बिछड़ने वाला अच्छा तो था पर अपना नहीं
जहाँ सुकूँ मिले उस ज़ाविए में ढाल मुझे
तिरा ही अक्स हूँ बच्चों की तरह पाल मुझे
मैं हर क़दम पे तिरे साथ ही रहूँगा दोस्त
तू आँख मीच के इक बार तो उछाल मुझे
गुल-ए-तर के हैं जैसी ख़ूबसूरत माँ की आँखें
ग़ज़लकारों की है पहली मोहब्बत माँ की आँखें
ये रंग-ओ-रूप आलीशान सा घर और दौलत
ये सब से और हैं ऊपर की शोहरत माँ की आँखें
सोते हैं चप्पलों का जो तकिया बना के रोज़
वो लोग जानते हैं सदा मौसमों का राज़
बेटे छिपा के रखते हैं ग़म अपनी आँख में
छिपता नहीं है माँ से मगर बेटियों का राज़
इक शख़्स ज़िंदगी में जब ख़ुदकुशी की सोचे
बढ़ जाएँ तब के तब ही ये दाम रस्सियों के
मुफ़लिस से पूछ लेना सूद-ओ-ज़ियाँ का मतलब
बे-घर ही जानता है अपने मकाँ का मतलब
ये लोग चल पड़े हैं बस तालियों की जानिब
अहल-ए-सुख़न से पूछो आह-ओ-फ़ुग़ाँ का मतलब
न समेट मुझको तू इस कदर कहीं तेरा हाथ जला न दूँ
तू ज़बान काट के रख मिरी मैं ये राज़ सब को बता न दूँ
मैं तुझे मनाने के वास्ते ये जहान तक से भी हूँ लड़ा
कभी डर नहीं था सलीब का मुझे डर था तुझ को गँवा न दूँ