Harsh Kumar Bhatnagar

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@mai_meri_kalam

Harsh Kumar Bhatnagar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Harsh Kumar Bhatnagar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
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Sher

ये सिसकती हुईं आँखें ये खनकती पायल दुख मनाएँ या ग़ज़ल लिखने का मौक़ा ढूँडें — Harsh Kumar Bhatnagar
राह तकते हुए आँखों का बुरा हाल हुआ दिल लगाने के लिए अब कोई चर्ख़ा ढूँढ़े — Harsh Kumar Bhatnagar
ज़िंदगी जीने का हक़ हर किसी को है यहाँ पर वक़्त-ए-आख़िर ही सही कोई जज़ीरा ढूँडे — Harsh Kumar Bhatnagar
शे'र कहना तो बड़ी बा'द की शय है मालिक बात करने का हमें पहले सलीक़ा देना — Harsh Kumar Bhatnagar
सोते हैं चप्पलों का जो तकिया बना के रोज़ वो लोग जानते हैं सदा मौसमों का राज़ — Harsh Kumar Bhatnagar
इक शख़्स ज़िंदगी में जब ख़ुद-कुशी की सोचे बढ़ जाएँ तब के तब ही ये दाम रस्सियों के — Harsh Kumar Bhatnagar
दूसरी सम्त से खेला नहीं है हम ने कभी ये हुनर आप का है आप तरीक़ा ढूँडे — Harsh Kumar Bhatnagar
एक दूजे के लिए अब कोई पागल नहीं है अब मुनासिब है कोई अपने ही जैसा ढूँडे — Harsh Kumar Bhatnagar
तू अपने ख़त में ज़बाँ काट कर के रख देना कि पढ़ते वक़्त उसे चीख भी सुनाई दे — Harsh Kumar Bhatnagar
कभी आसान करती है कभी मुश्किल बढ़ाती है ये दुनिया मार के ठोकर हमें चलना सिखाती है — Harsh Kumar Bhatnagar
मैं अपने आप को कब तक ये समझाता फिरूँ बिछड़ने वाला अच्छा तो था पर अपना नहीं — Harsh Kumar Bhatnagar
बेटे छिपा के रखते हैं ग़म अपनी आँख में छिपता नहीं है माँ से मगर बेटियों का राज़ — Harsh Kumar Bhatnagar
जंग लड़ रहे हैं तो इतना याद रखिएगा वार दिल पे होगा तो आप हार जाएँगे — Harsh Kumar Bhatnagar

Ghazal

तबीब ने मिरे ज़ख़्मों को जब नकार दिया ये दुश्मनों ने सुना और मुझ को मार दिया हर एक माँ से है बस एक ही सवाल मिरा कि उन को बदले में दुनिया ने उतना प्यार दिया मैं डूबते हुओं को जब बचाने को निकला मुझे सफ़ीने से मल्लाह ने उतार दिया वगरना आज भी नज़रें चुराया करते लोग वो इक हसीना के ग़म ने मुझे सँवार दिया सवाल मुझ सेे वो हर दम हज़ार करती है मैं सोचता हूँ उसे क्यूँ ही इख़्तियार दिया मैं उस के वास्ते दुनिया को छोड़ आया तब वो हम-नशीं ने मुझे अपना ए'तिबार दिया पिता को कह दिया जब क्या किया है मेरे लिए ख़ुदा ने तब मुझे जन्नत से ही नकार दिया — Harsh Kumar Bhatnagar
पहले बहता हुआ आँखों से समुंदर देखें या चमकता हुआ उस में कोई गौहर देखें सर पटकने से कभी पाप धुलेंगे तो नहीं अब किसी प्यासे को पानी ही पिला कर देखें घर की दीवारें सजा तो ली हैं शीशों से पर ख़ुद को दुनिया से छिपाएँ या मुक़द्दर देखें कब तलक राह में ही बैठे रहेंगे हम लोग देर करने से तो अच्छा है कि चल कर देखें एक तो वक़्त का पहले से तक़ाज़ा है बहुत अब कोई शे'र सुनाएँ या मुकर्रर देखें रक़्स करता हुआ बस आप ने बंदर देखा उस मदारी का छिपाया हुआ नश्तर देखें आप ने तो है फ़क़त हिज्र का दल-दल देखा इक दफ़ा तो किसी मुफ़लिस का मुक़द्दर देखें — Harsh Kumar Bhatnagar
किसी के लिए ख़ुद को इतना बदलना ज़रूरी नहीं अगर है मोहब्बत तो फिर कोई वा'दा ज़रूरी नहीं कहाँ पूछती है ख़िज़ाँ आने से क़ब्ल इन फूलों से अगर दूर होना है तुझ को तो लड़ना ज़रूरी नहीं यूँँ बीते पलों को तिरा याद करना मुनासिब है पर सहारे इसी के हमेशा भी रहना ज़रूरी नहीं सदा एक सपने के जैसे मिरी आँखों में रहती है उसे ढूँडने के लिए कोई नक़्शा ज़रूरी नहीं ख़ुदा ने लिखा है तो कुछ सोच कर ही लिखा होगा दोस्त वगरना ग़मों का मुक़द्दर में होना ज़रूरी नहीं मैं ही क्यूँ ये हिजरत को काँधे पे डाले फिरूँ बरसों तक फ़क़त राह-ए-उल्फ़त में बस मेरा मरना ज़रूरी नहीं कलाकार को ज़ात से फ़र्क़ पड़ता नहीं है कोई तिरा भी ज़माने को दुखड़ा सुनाना ज़रूरी नहीं — Harsh Kumar Bhatnagar
तुम्हारे बा'द ये दिल गर दुखा नहीं होता हमारे पाँव में भी आबला नहीं होता अभी भी वक़्त है तू रोक ले वगरना दोस्त बिछड़ने वालों से फिर राब्ता नहीं होता क़लम की नोक से दुनिया भी काँप जाती है ये दस्तख़त से ज़माने में क्या नहीं होता ये ज़िंदगी तो फ़क़त चार दिन की है जी ले वगरना बा'द में कुछ फ़ैसला नहीं होता अना से लोगों के घर तक बिखरने लगते हैं तू कहता है कि कोई मसअला नहीं होता अगर समझने की कोशिश भी करता तू उस वक़्त तो आज शे'र में भी वसवसा नहीं होता जो कुछ भी होना है जो कुछ हुआ है लिख रखा है बिना ख़ुदा के कोई मो'जिज़ा नहीं होता — Harsh Kumar Bhatnagar
हर किसी को नहीं होती हैं मुयस्सर ग़ज़लें चाँद तारों के अलावा भी हैं बेहतर ग़ज़लें अब कोई ख़्वाब सताता नहीं हम को उस का नींद आ जाती है अब रात को पढ़ कर ग़ज़लें अब चराग़ों से कोई काम नहीं लेंगे हम घर को रौशन किए जाती हैं मुनव्वर ग़ज़लें ज़िंदगी जीने को छह चीज़ें ही काफ़ी हैं बहुत इश्क़ घर-बार अना दोस्ती दफ़्तर ग़ज़लें आप तलवारों से मक़्तल में बहाओगे ख़ून हम वरक़ फाड़ के फेंकेंगे ये नश्तर ग़ज़लें हम को आता नहीं रोते हुए ग़ज़लें कहना हम तो कहते हैं सदा बज़्म में हँस कर ग़ज़लें चार ग़ज़लों से ही अब काम लिया जाता है दोस्त यूँँ तो रक्खी हैं मिरे पास बहत्तर ग़ज़लें — Harsh Kumar Bhatnagar