मत पूछ मुफ़्लिसों से तू ये ठोकरों का राज़
कैसे छिपा के रखते हैं ये आबलों का राज़
जल्लाद का तो काम है लाशें समेटना
ज़ंजीर जानती है सभी क़ैदियों का राज़
बेटे छिपा के रखते हैं ग़म अपनी आँख में
छिपता नहीं है माँ से मगर बेटियों का राज़
इक आदमी का हल है सदा आदमी के पास
औरत ही जानती हैं सदा औरतों का राज़
सिलती रही मैं सूट शब-ओ-रोज़ इश्क़ में
जब तक न पूछा चर्ख ने ये हिचकियों का राज़
सोते हैं चप्पलों का जो तकिया बना के रोज़
वो लोग जानते हैं सदा मौसमों का राज़
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