mat pooch muflison se tu ye thokron ka raaz | मत पूछ मुफ़्लिसों से तू ये ठोकरों का राज़

  - Harsh Kumar Bhatnagar

मत पूछ मुफ़्लिसों से तू ये ठोकरों का राज़
कैसे छिपा के रखते हैं ये आबलों का राज़

जल्लाद का तो काम है लाशें समेटना
ज़ंजीर जानती है सभी क़ैदियों का राज़

बेटे छिपा के रखते हैं ग़म अपनी आँख में
छिपता नहीं है माँ से मगर बेटियों का राज़

इक आदमी का हल है सदा आदमी के पास
औरत ही जानती हैं सदा औरतों का राज़

सिलती रही मैं सूट शब-ओ-रोज़ इश्क़ में
जब तक न पूछा चर्ख ने ये हिचकियों का राज़

सोते हैं चप्पलों का जो तकिया बना के रोज़
वो लोग जानते हैं सदा मौसमों का राज़

  - Harsh Kumar Bhatnagar

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