यार तुम ही मिरी मोहब्बत हो
काश तुमको भी मेरी आदत हो
मेरी ग़ज़लों में ज़िक्र है तेरा
इन को पढ़ कर तुझे भी हैरत हो
मर गया लड़का इक मोहब्बत में
काश उसको नसीब जन्नत हो
बेचा है जिस्म इक तवायफ़ ने
धंधे में थोड़ी सी तो लागत हो
पोल सब की तो खुल ही जाएगी
गर मिरे घर में एक औरत हो
उस ने बर्बाद है किया मुझको
सो उसे थोड़ी सी तो ग़ैरत हो
हार जाते हैं सब मोहब्बत में
अब भले हाथ में वकालत हो
एक टक देखा है मुझे उसने
यार अब तो मुझे इज़ाफ़त हो
हम ही क्यूँँ पीछा अब करें उसका
थोड़ी उसकी तरफ़ से हरकत हो
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