
तिरी कमसिन सी आँखें और ज़ुल्फ़ों से मोहब्बत है
जहाँ हैं नक़्श-ए-पा तेरे वो रस्तों से मोहब्बत है
तिरी ता'रीफ़ में जब से ग़ज़ल लिक्खी है शाइ'र ने
तभी से हम को काग़ज़ और हर्फ़ों से मोहब्बत है
— Harsh Kumar Bhatnagar
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