न समेट मुझ को तू इस कदर कहीं तेरा हाथ जला न दूँतू ज़बान काट के रख मिरी मैं ये राज़ सब को बता न दूँमैं तुझे मनाने के वास्ते ये जहान तक से भी हूँ लड़ाकभी डर नहीं था सलीब का मुझे डर था तुझ को गँवा न दूँ— Harsh Kumar Bhatnagar