बन्दे को इश्क़ में तो चढ़ा है दिवानापन
आँखों में खो गया है न देखे लब-ओ-दहन
कब तक मैं चाँद में ही निहारूँगा बस तुझे
घर में न जाने तेरा भी कब होगा आगमन
उसके भी दिल में मेरे लिए कुछ तो ख़ास है
मिलने वो आती चुपके से करके इशारतन
दिल तोड़ने का फ़न तो कभी सीखा ही नहीं
हँस कर गले लगाना ही मेरा है फ़ितरतन
बस आप ही के कहने पे चल कर हैं आए हम
अब यूँँ न कहना लड़के में थोड़ा है भोलपन
हर दिन वो साल मुझ को बड़ा याद आता है
इस फ़रवरी के माह में बिछड़े थे दो बदन
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