उसे अकेला तो मैं छोड़ जा नहीं सकता
मगर मैं दर्द भी अपना बता नहीं सकता
हाँ लिखता हूँ मैं उसी के लिए हमेशा पर
ग़ज़ल में नाम तो उसका मैं ला नहीं सकता
ये इश्क़ ने तो सदा ज़ख़्म ही दिए हैं सो
मैं तुझ सेे और त'अल्लुक़ बढ़ा नहीं सकता
हाँ तेरे जाने का ग़म थोड़ा सा ज़ियादा है
मगर मैं आँख में आँसू भी ला नहीं सकता
बिछड़ते वक़्त वो इक बार भी नहीं पलटा
मैं बार बार ये क़िस्सा सुना नहीं सकता
As you were reading Shayari by Harsh Kumar Bhatnagar
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