ज़ख़्मों का अब हिसाब रक्खा है
आँखों में हम ने आब रक्खा है
मुझको अब तोड़ तू नहीं सकता
दिल को मैंने भी ताब रक्खा है
आँखों में उसकी भी नशा है सो
नाम उसका शराब रक्खा है
कोई पहचान भी नहीं सकता
चेहरे पे इक नक़ाब रक्खा है
हूँ मैं मसरूफ़ उसकी ख़ातिर पर
ख़ुद को अब दस्तियाब रक्खा है
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