पहले मैं जी भर के उसे ग़ुस्सा दिलाने लगता हूँ
फिर माँग कर के माफ़ी मैं ख़ुद ही मनाने लगता हूँ
उस से मोहब्बत तो नहीं पर मुझको डर भी लगता है
आते ही उसके सिगरटें भी मैं छिपाने लगता हूँ
वो भी मिरी माँ जैसे मुझको डाँटती ही रहती है
मैं भी सदा फिर उसकी हाँ में हाँ मिलाने लगता हूँ
मुझको वो जब भी कोई अपना ग़म सुनाने लगती है
मैं उसके ग़म से अपनी कुछ ग़ज़लें बनाने लगता हूँ
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