मौज़ूँ नहीं अगर तो मोहब्बत न कीजियो
दरिया को पार करने की जुरअत न कीजियो
सावन की धूप आन पड़ेगी गुलों पे जब
काँटों से तब कहीं तू बग़ावत न कीजियो
हर शख़्स चाहता है मोहब्बत मिले उसे
हर शख़्स से मगर तू अक़ीदत न कीजियो
सब कुछ है सामने तिरे बस रास्ते को देख
मंज़िल से इश्क़ है तो अदावत न कीजियो
ख़ुद भी भटक रहे हैं तिरे ऊँट जा-ब-जा
सहरा में घर बनाने की जुरअत न कीजियो
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