जाने की सोचता हूँ जब कभी बचपन की तरफ़

मैं पहुँच जाता हूँ तब फिर किसी बंधन की तरफ़

बेवक़ूफ़ी कहूँ इस को या कहूँ मेरा ग़ुरूर
जो चला जाता हूँ मैं रोज़ ही उलझन की तरफ़

क़ैद में रखने से दस्तूर नहीं बदलेगा
तितलियाँ जा रही हैं फिर उसी आँगन की तरफ़

झोलियाँ बोझ उठाने को बनी तो नहीं हैं
डाल देना कभी कुछ फूल भी दामन की तरफ़

इस ज़माने से कहीं दूर चले जाते हैं
तू मिरे मन की तरफ़ आ मैं तिरे मन की तरफ़

— Harsh Kumar Bhatnagar

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