ik thakaavat se bhare hain shab ke aañsu | इक थकावट से भरे हैं शब के आँसू

  - Harsh Kumar Bhatnagar

इक थकावट से भरे हैं शब के आँसू
चाँद के पीछे छिपे हैं शब के आँसू

मत करो इतना गिला इन आँसुओं से
मंज़िलों के रास्ते हैं शब के आँसू

वाक़िआ ये रोज़ ही सुनते हैं हम लोग
ज़िंदगी के वसवसे हैं शब के आँसू

सट के बैठे हैं दर-ओ-दीवार से हम
रेंगते घर में दिखे हैं शब के आँसू

मुझको क्या हिजरत कोई ग़म दे सकेगी
पास पहले से पड़े हैं शब के आँसू

कोई झोंका ही चुरा ले चुपके से अब
बाम पे कब से रखे हैं शब के आँसू

एक पौधा हिज्र का उगने लगा है
जब से मिट्टी में मिले हैं शब के आँसू

  - Harsh Kumar Bhatnagar

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