jo mujh pe guzri mujhe pata hai jo tujh pe guzri tujhe pata hai | जो मुझ पे गुज़री मुझे पता है जो तुझ पे गुज़री तुझे पता है

  - Harsh Kumar Bhatnagar

जो मुझ पे गुज़री मुझे पता है जो तुझ पे गुज़री तुझे पता है
जो ख़्वाब टूटा वो दोनों का था जो बच गया है वो फ़ासला है

मैं तोहमतें उसको दे न पाया कभी मैं उसको भुला न पाया
बिछड़ के कैसे वो ख़ुश रहा है मिरा तो सब कुछ बिखर गया है

बग़ैर उसके मैं क्या करूँँगा ग़ज़ल के मिसरों में क्या लिखूँगा
ये रंज मुझको डुबा रहा है मगर ये शाइर बना रहा है

मैं दर-ब-दर जो भटक रहा हूँ तलाश में तेरी घट रहा हूँ
जो वक़्त ख़ुद के लिए रखा था वो वक़्त कब का गुज़र चुका है

  - Harsh Kumar Bhatnagar

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